वाल्मीकी रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ६९
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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AI वाल्मीकि रामायण
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AI बालकाण्ड सर्ग- ६९
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बालकाण्डम्
एकोनसप्ततितमः सर्गः (सर्ग 69)
( दल-बलसहित राजा दशरथ की मिथिला-यात्रा और वहाँ राजा जनक के द्वारा उनका स्वागत-सत्कार )
श्लोक:
ततो रात्र्यां व्यतीतायां सोपाध्यायः सबान्धवः।
राजा दशरथो हृष्टः सुमन्त्रमिदमब्रवीत्॥१॥
भावार्थ :-
तदनन्तर रात्रि व्यतीत होने पर उपाध्याय और बन्धुबान्धवों सहित राजा दशरथ हर्ष में भरकर सुमन्त्र से इस प्रकार बोले-॥१॥
श्लोक:
अद्य सर्वे धनाध्यक्षा धनमादाय पुष्कलम्।
व्रजन्त्वग्रे सुविहिता नानारत्नसमन्विताः॥२॥
भावार्थ :-
‘आज हमारे सभी धनाध्यक्ष (खजांची) बहुत-सा धन लेकर नाना प्रकार के रत्नों से सम्पन्न हो सबसे आगे चलें। उनकी रक्षाके लिये हर तरह की सुव्यवस्था होनी चाहिये॥२॥
श्लोक:
चतुरंगबलं चापि शीघ्रं निर्यातु सर्वशः।
ममाज्ञासमकालं च यानं युग्यमनुत्तमम्॥३॥
भावार्थ :-
‘सारी चतुरंगिणी सेना भी यहाँ से शीघ्र ही कूचकर दे। अभी मेरी आज्ञा सुनते ही सुन्दर-सुन्दर पालकियाँ और अच्छे-अच्छे घोड़े आदि वाहन तैयार होकर चल दें॥३॥
श्लोक:
वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिरथ कश्यपः।
मार्कण्डेयस्तु दीर्घायुर्ऋषिः कात्यायनस्तथा॥४॥
एते द्विजाः प्रयान्त्वग्रे स्यन्दनं योजयस्व मे।
यथा कालात्ययो न स्याद् दूता हि त्वरयन्ति माम्॥५॥
भावार्थ :-
‘वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, कश्यप, दीर्घजीवी मार्कण्डेय मुनि तथा कात्यायन-ये सभी ब्रह्मर्षि आगे-आगे चलें। मेरा रथ भी तैयार करो देर नहीं होनी चाहिये। राजा जनक के दूत मुझे जल्दी करने के लिये प्रेरित कर रहे हैं’॥४-५॥
श्लोक:
वचनाच्च नरेन्द्रस्य सेना च चतुरंगिणी।
राजानमृषिभिः सार्धं व्रजन्तं पृष्ठतोऽन्वयात्॥६॥
भावार्थ :-
राजा की इस आज्ञा के अनुसार चतुरंगिणी सेना तैयार हो गयी और ऋषियों के साथ यात्रा करते हुए महाराज दशरथ के पीछे-पीछे चली॥६॥
श्लोक:
गत्वा चतुरहं मार्गं विदेहानभ्युपेयिवान्।
राजा च जनकः श्रीमान् श्रुत्वा पूजामकल्पयत्॥७॥
भावार्थ :-
चार दिन का मार्ग तय करके वे सब लोग विदेहदेश में जा पहुँचे। उनके आगमन का समाचार सुनकर श्रीमान् राजा जनक ने स्वागत-सत्कार की तैयारी की॥७॥
श्लोक:
ततो राजानमासाद्य वृद्धं दशरथं नृपम्।
मुदितो जनको राजा प्रहर्षं परमं ययौ॥८॥
भावार्थ :-
तत्पश्चात् आनन्दमग्न हुए राजा जनक बूढ़े महाराज दशरथ के पास पहुँचे उनसे मिलकर उन्हें बड़ा हर्ष हुआ॥८॥
श्लोक:
उवाच वचनं श्रेष्ठो नरश्रेष्ठं मुदान्वितम्।
स्वागतं ते नरश्रेष्ठ दिष्ट्या प्राप्तोऽसि राघव॥९॥
भावार्थ :-
राजाओं में श्रेष्ठ मिथिलानरेश ने आनन्दमग्न हुए पुरुषप्रवर राजा दशरथ से कहा- ’नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! आपका स्वागत है,मेरे बड़े भाग्य, जो आप यहाँ पधारे॥९॥
श्लोक:
पुत्रयोरुभयोः प्रीतिं लप्स्यसे वीर्यनिर्जिताम्।
दिष्ट्या प्राप्तो महातेजा वसिष्ठो भगवानृषिः॥१०॥
सह सर्वैर्द्धिजश्रेष्ठैर्देवैरिव शतक्रतुः।
भावार्थ :-
‘आप यहाँ अपने दोनों पुत्रों की प्रीति प्राप्त करेंगे, जो उन्होंने अपने पराक्रम से जीतकर पायी है। महातेजस्वी भगवान् वसिष्ठ मुनि ने भी हमारे सौभाग्य से ही यहाँ पदार्पण किया है। ये इन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणों के साथ वैसी ही शोभा पा रहे हैं, जैसे देवताओं के साथ इन्द्र सुशोभित होते हैं॥१० १/२॥
श्लोक:
दिष्ट्या मे निर्जिता विघ्ना दिष्ट्या मे पूजितं कुलम्॥११॥
राघवैः सह सम्बन्धाद् वीर्यश्रेष्ठैर्महाबलैः।
भावार्थ :-
‘सौभाग्यसे मेरी सारी विघ्न-बाधाएँ पराजित हो गयीं। रघुकुल के महापुरुष महान् बल से सम्पन्न और पराक्रम में सबसे श्रेष्ठ होते हैं। इस कुल के साथ सम्बन्ध होने के कारण आज मेरे कुल का सम्मान बढ़ गया॥११ १/२॥
श्लोक:
श्वः प्रभाते नरेन्द्र त्वं संवर्तयितुमर्हसि॥१२॥
यज्ञस्यान्ते नरश्रेष्ठ विवाहमृषिसत्तमैः।
भावार्थ :-
‘नरश्रेष्ठ नरेन्द्र! कल सबेरे इन सभी महर्षियों के साथ उपस्थित हो मेरे यज्ञ की समाप्ति के बाद आप श्रीराम के विवाह का शुभकार्य सम्पन्न करें’॥१२ १/२॥
श्लोक:
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा ऋषिमध्ये नराधिपः॥१३॥
वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठः प्रत्युवाच महीपतिम्।
भावार्थ :-
ऋषियों की मण्डली में राजा जनक की यह बात सुनकर बोलने की कला जानने वाले विद्वानों में श्रेष्ठ एवं वाक्यमर्मज्ञ महाराज दशरथ ने मिथिलानरेश को इस प्रकार उत्तर दिया-॥१३ १/२॥
श्लोक:
प्रतिग्रहो दातृवशः श्रुतमेतन्मया पुरा॥१४॥
यथा वक्ष्यसि धर्मज्ञ तत् करिष्यामहे वयम्।
भावार्थ :-
‘धर्मज्ञ! मैंने पहले से यह सुन रखा है कि प्रतिग्रह दाता के अधीन होता है अतः आप जैसा कहेंगे, हम वैसा ही करेंगे’॥१४ १/२॥
श्लोक:
तद् धर्मिष्ठं यशस्यं च वचनं सत्यवादिनः॥१५॥
श्रुत्वा विदेहाधिपतिः परं विस्मयमागतः।
भावार्थ :-
सत्यवादी राजा दशरथ का वह धर्मानुकूल तथा यशोवर्धक वचन सुनकर विदेहराज जनक को बड़ा विस्मय हुआ॥१५ १/२॥
श्लोक:
ततः सर्वे मुनिगणाः परस्परसमागमे॥१६॥
हर्षेण महता युक्तास्तां रात्रिमवसन् सुखम्।
भावार्थ :-
तदनन्तर सभी महर्षि एक-दूसरे से मिलकर बहुत प्रसन्न हुए और सबने बड़े सुख से वह रात बितायी॥१६ १/२॥
श्लोक:
अथ रामो महातेजा लक्ष्मणेन समं ययौ॥१७॥
विश्वामित्रं पुरस्कृत्य पितुः पादावुपस्पृशन्।
भावार्थ :-
इधर महातेजस्वी श्रीराम विश्वामित्रजी को आगे करके लक्ष्मण के साथ पिताजी के पास गये और उनके चरणों का स्पर्श किया॥१७ १/२॥
श्लोक:
राजा च राघवौ पुत्रौ निशाम्य परिहर्षितः॥१८॥
उवास परमप्रीतो जनकेनाभिपूजितः।
भावार्थ :-
राजा दशरथ ने भी जनक के द्वारा आदर-सत्कार पाकर बड़ी प्रसन्नता का अनुभव किया तथा अपने दोनों रघुकुल-रत्न पुत्रों को सकुशल देखकर उन्हें अपार हर्ष हुआ। वे रात में बड़े सुख से वहाँ रहे॥१८ १/२॥
श्लोक:
जनकोऽपि महातेजाः क्रिया धर्मेण तत्त्ववित्।
यज्ञस्य च सुताभ्यां च कृत्वा रात्रिमुवास ह॥१९॥
भावार्थ :-
महातेजस्वी तत्त्वज्ञ राजा जनक ने भी धर्म के अनुसार यज्ञ कार्य सम्पन्न किया तथा अपनी दोनों कन्याओं के लिये मंगलाचार का सम्पादन करके सुख से वह रात्रि व्यतीत की॥१९॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः॥६९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में उनहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥६९॥
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