वाल्मीकी रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ६०

बालकाण्ड सर्ग- ६०

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बालकाण्ड सर्ग- ६०

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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बालकाण्ड सर्ग- ६०

AI वाल्मीकि रामायण
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बालकाण्ड सर्ग- ६०

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बालकाण्डम्
षष्टितमः सर्गः (सर्ग 60)

( ऋषियोंद्वारा यज्ञ का आरम्भ, त्रिशंकु का सशरीर स्वर्गगमन, इन्द्र द्वारा स्वर्ग से उनके गिराये जाने पर क्षुब्ध हुए विश्वामित्र का नूतन देवसर्ग के लिये उद्योग )

श्लोक:
तपोबलहतान् ज्ञात्वा वासिष्ठान् समहोदयान्।
ऋषिमध्ये महातेजा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत॥१॥

भावार्थ :-
[शतानन्दजी कहते हैं- श्रीराम!] महोदयसहित वसिष्ठ के पुत्रों को अपने तपोबल से नष्ट हुआ जानमहातेजस्वी विश्वामित्र ने ऋषियों के बीच में इस प्रकार कहा-॥१॥

श्लोक:
अयमिक्ष्वाकुदायादस्त्रिशङ्करिति विश्रुतः।
धर्मिष्ठश्च वदान्यश्च मां चैव शरणं गतः॥२॥

भावार्थ :-
‘मुनिवरो! ये इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न राजा त्रिशंकु हैं। ये विख्यात नरेश बड़े ही धर्मात्मा और दानी रहे हैं तथा इस समय मेरी शरण में आये हैं॥२॥

श्लोक:
स्वेनानेन शरीरेण देवलोकजिगीषया।
यथायं स्वशरीरेण देवलोकं गमिष्यति॥३॥
तथा प्रवर्त्यतां यज्ञो भवद्भिश्च मया सह।

भावार्थ :-
‘इनकी इच्छा है कि मैं अपने इसी शरीर से देवलोक पर अधिकार प्राप्त करूँ। अतः आपलोग मेरे साथ रहकर ऐसे यज्ञ का अनुष्ठान करें, जिससे इन्हें इस शरीर से ही देवलोक की प्राप्ति हो सके’॥३ १/२॥

श्लोक:
विश्वामित्रवचः श्रुत्वा सर्व एव महर्षयः॥४॥
ऊचुः समेताः सहसा धर्मज्ञा धर्मसंहितम्।
अयं कुशिकदायादो मुनिः परमकोपनः॥५॥
यदाह वचनं सम्यगेतत् कार्यं न संशयः।

भावार्थ :-
विश्वामित्रजी की यह बात सुनकर धर्म को जानने वाले सभी महर्षियों ने सहसा एकत्र होकर आपस में धर्मयुक्त परामर्श किया- ’ब्राह्मणो! कुशिक के पुत्र विश्वामित्र मुनि बड़े क्रोधी हैं ये जो बात कह रहे हैं, उसका ठीक तरह से पालन करना चाहिये, इसमें संशय नहीं है॥४-५ १/२॥

श्लोक:
अग्निकल्पो हि भगवान् शापं दास्यति रोषतः॥६॥
तस्मात् प्रवर्त्यतां यज्ञः सशरीरो यथा दिवि।
गच्छेदिक्ष्वाकुदायादो विश्वामित्रस्य तेजसा॥७॥

भावार्थ :-
‘ये भगवान् विश्वामित्र अग्नि के समान तेजस्वी हैं। यदि इनकी बात नहीं मानी गयी तो ये रोषपूर्वक शाप दे देंगे। इसलिये ऐसे यज्ञ का आरम्भ करना चाहिये, जिससे विश्वामित्र के तेज से ये इक्ष्वाकुनन्दन त्रिशंकु सशरीर स्वर्गलोक में जा सकें’॥६-७॥

श्लोक:
ततः प्रवर्त्यतां यज्ञः सर्वे समधितिष्ठत।
एवमुक्त्वा महर्षयः संजह्वस्ताः क्रियास्तदा॥८॥

भावार्थ :-
इस तरह विचार करके उन्होंने सर्वसम्मति से यह निश्चय किया कि ‘यज्ञ आरम्भ किया जाय।’ ऐसा निश्चय करके महर्षियों ने उस समय अपना-अपना कार्य आरम्भ किया॥८॥

श्लोक:
याजकश्च महातेजा विश्वामित्रोऽभवत् क्रतौ।
ऋत्विजश्चानुपूर्येण मन्त्रवन्मन्त्रकोविदाः॥९॥
चक्रुः सर्वाणि कर्माणि यथाकल्पं यथाविधि।

भावार्थ :-
महातेजस्वी विश्वामित्र स्वयं ही उस यज्ञमें याजक (अध्वर्यु) हुए। फिर क्रमशः अनेक मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण ऋत्विज् हुए; जिन्होंने कल्पशास्त्रके अनुसार विधि एवं मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारे कार्य सम्पन्न किये॥९ १/२॥

श्लोक:
ततः कालेन महता विश्वामित्रो महातपाः॥१०॥
चकारावाहनं तत्र भागार्थं सर्वदेवताः।
नाभ्यागमंस्तदा तत्र भागार्थं सर्वदेवताः॥११॥

भावार्थ :-
तदनन्तर बहुत समयतक यत्नपूर्वक मन्त्रपाठ करके महातपस्वी विश्वामित्र ने अपना-अपना भाग ग्रहण करने के लिये सम्पूर्ण देवताओं का आवाहन किया; परंतु उस समय वहाँ भाग लेने के लिये वे सब देवता नहीं आये॥१०-११॥

श्लोक:
ततः कोपसमाविष्टो विश्वामित्रो महामुनिः।
स्रुवमुद्यम्य सक्रोधस्त्रिशङ्कमिदमब्रवीत्॥१२॥

भावार्थ :-
इससे महामुनि विश्वामित्र को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने स्रुवा उठाकर रोष के साथ राजा त्रिशंकु से इस प्रकार कहा- ॥१२॥

श्लोक:
पश्य मे तपसो वीर्यं स्वार्जितस्य नरेश्वर।
एष त्वां स्वशरीरेण नयामि स्वर्गमोजसा॥१३॥

भावार्थ :-
‘नरेश्वर! अब तुम मेरे द्वारा उपार्जित तपस्या का बल देखो। मैं अभी तुम्हें अपनी शक्ति से सशरीर स्वर्गलोक में पहुँचाता हूँ॥१३॥

श्लोक:
दुष्प्रापं स्वशरीरेण स्वर्गं गच्छ नरेश्वर।
स्वार्जितं किंचिदप्यस्ति मया हि तपसः फलम्॥१४॥
राजंस्त्वं तेजसा तस्य सशरीरो दिवं व्रज।

भावार्थ :-
‘राजन्! आज तुम अपने इस शरीर के साथ ही दुर्लभ स्वर्गलोक को जाओ। नरेश्वर! यदि मैंने तपस्या का कुछ भी फल प्राप्त किया है तो उसके प्रभाव से तुम सशरीर स्वर्गलोक को जाओ’॥१४ १/२॥

श्लोक:
उक्तवाक्ये मुनौ तस्मिन् सशरीरो नरेश्वरः॥१५॥
दिवं जगाम काकुत्स्थ मुनीनां पश्यतां तदा।

भावार्थ :-
श्रीराम! विश्वामित्र मुनि के इतना कहते ही राजा त्रिशंकु सब मुनियों के देखते-देखते उस समय अपने शरीर के साथ ही स्वर्गलोक को चले गये॥१५ १/२॥

श्लोक:
स्वर्गलोकं गतं दृष्ट्वा त्रिशङ्कं पाकशासनः॥१६॥
सह सर्वैः सुरगणैरिदं वचनमब्रवीत्।

भावार्थ :-
त्रिशंकु को स्वर्गलोक में पहुँचा हुआ देख समस्त देवताओं के साथ पाकशासन इन्द्र ने उनसे इस प्रकार कहा-॥१६ १/२॥

श्लोक:
त्रिशङ्को गच्छ भूयस्त्वं नासि स्वर्गकृतालयः॥१७॥
गुरुशापहतो मूढ पत भूमिमवाक्शिराः।

भावार्थ :-
‘मूर्ख त्रिशंकु! तू फिर यहाँ से लौट जा, तेरे लिये स्वर्ग में स्थान नहीं है। तू गुरु के शाप से नष्ट हो चुका है, अतः नीचे मुँह किये पुनः पृथ्वी पर गिर जा’॥१७ १/२॥

श्लोक:
एवमुक्तो महेन्द्रेण त्रिशङ्करपतत् पुनः॥१८॥
विक्रोशमानस्त्राहीति विश्वामित्रं तपोधनम्।

भावार्थ :-
इन्द्र के इतना कहते ही राजा त्रिशंकु तपोधन विश्वामित्र को पुकार कर ‘त्राहि-त्राहि’ की रट लगाते हुए पुनः स्वर्ग से नीचे गिरे॥१८ १/२॥

श्लोक:
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य क्रोशमानस्य कौशिकः॥१९॥
रोषमाहारयत् तीव्र तिष्ठ तिष्ठति चाब्रवीत्।

भावार्थ :-
चीखते-चिल्लाते हुए त्रिशंकु की वह करुण पुकार सुनकर कौशिक मुनि को बड़ा क्रोध हुआ। वे त्रिशंकु से बोले– ‘राजन् ! वहीं ठहर जा, वहीं ठहरजा’ (उनके ऐसा कहने पर त्रिशंकु बीच में ही लटके रह गये)॥१९ १/२॥

श्लोक:
ऋषिमध्ये स तेजस्वी प्रजापतिरिवापरः॥२०॥
सृजन् दक्षिणमार्गस्थान् सप्तर्षीनपरान् पुनः।
नक्षत्रवंशमपरमसृजत् क्रोधमूर्च्छितः॥२१॥

भावार्थ :-
तत्पश्चात् तेजस्वी विश्वामित्र ने ऋषिमण्डली के बीच दूसरे प्रजापति के समान दक्षिण मार्ग के लिये नये सप्तर्षियों की सृष्टि की तथा क्रोध से भरकर उन्होंने नवीन नक्षत्रों का भी निर्माण कर डाला॥२०-२१॥

श्लोक:
दक्षिणां दिशमास्थाय ऋषिमध्ये महायशाः।
सृष्ट्वा नक्षत्रवंशं च क्रोधेन कलुषीकृतः॥२२॥
अन्यमिन्द्रं करिष्यामि लोको वा स्यादनिन्द्रकः।
दैवतान्यपि स क्रोधात् स्रष्टं समुपचक्रमे॥२३॥

भावार्थ :-
वे महायशस्वी मुनि क्रोध से कलुषित हो दक्षिण दिशा में ऋषिमण्डली के बीच नूतन नक्षत्रमालाओं की सृष्टि करके यह विचार करने लगे कि ‘मैं दूसरे इन्द्र की सृष्टि करूँगा अथवा मेरे द्वारा रचित स्वर्गलोक बिना इन्द्र के ही रहेगा।’ ऐसा निश्चय करके उन्होंने क्रोधपूर्वक नूतन देवताओं की सृष्टि प्रारम्भ की॥२२-२३॥

श्लोक:
ततः परमसम्भ्रान्ताः सर्षिसङ्गाः सुरासुराः।
विश्वामित्रं महात्मानमूचुः सानुनयं वचः॥२४॥

भावार्थ :-
इससे समस्त देवता, असुर और ऋषि-समुदाय बहुत घबराये और सभी वहाँ आकर महात्मा विश्वामित्र से विनयपूर्वक बोले-॥२४॥

श्लोक:
अयं राजा महाभाग गुरुशापपरिक्षतः।
सशरीरो दिवं यातुं नार्हत्येव तपोधन॥२५॥

भावार्थ :-
‘महाभाग! ये राजा त्रिशंकु गुरु के शाप से अपना पुण्य नष्ट करके चाण्डाल हो गये हैं; अतः तपोधन ! ये सशरीर स्वर्ग में जाने के कदापि अधिकारी नहीं हैं’॥२५॥

श्लोक:
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा देवानां मुनिपुंगवः।
अब्रवीत् सुमहद् वाक्यं कौशिकः सर्वदेवताः॥२६॥

भावार्थ :-
उन देवताओं की यह बात सुनकर मुनिवर कौशिक ने सम्पूर्ण देवताओं से परमोत्कृष्ट वचन कहा-॥२६॥

श्लोक:
सशरीरस्य भद्रं वस्त्रिशङ्कोरस्य भूपतेः।
आरोहणं प्रतिज्ञातं नानृतं कर्तुमुत्सहे॥२७॥

भावार्थ :-
‘देवगण! आपका कल्याण हो मैंने राजा त्रिशंक को सदेह स्वर्ग भेजनेकी प्रतिज्ञा कर ली है। अतः उसे मैं झूठी नहीं कर सकता॥२७॥

श्लोक:
स्वर्गोऽस्तु सशरीरस्य त्रिशङ्कोरस्य शाश्वतः।
नक्षत्राणि च सर्वाणि मामकानि ध्रुवाण्यथ॥२८॥
यावल्लोका धरिष्यन्ति तिष्ठन्त्वेतानि सर्वशः।
यत् कृतानि सुराः सर्वे तदनुज्ञातुमर्हथ॥२९॥

भावार्थ :-
‘इन महाराज त्रिशंकु को सदा स्वर्गलोक का सुख प्राप्त होता रहे। मैंने जिन नक्षत्रों का निर्माण किया है, वे सब सदा मौजूद रहें। जब तक संसार रहे, तब तक ये सभी वस्तुएँ, जिनकी मेरे द्वारा सृष्टि हुई है, सदा बनी रहें। देवताओ! आप सब लोग इन बातों का अनुमोदन करें’॥२८-२९॥

श्लोक:
एवमुक्ताः सुराः सर्वे प्रत्यूचुर्मुनिपुंगवम्।
एवं भवतु भद्रं ते तिष्ठन्त्वेतानि सर्वशः॥३०॥
गगने तान्यनेकानि वैश्वानरपथाद बहिः।
नक्षत्राणि मुनिश्रेष्ठ तेषु ज्योतिःषु जाज्वलन्॥३१॥
अवाक्शिरास्त्रिशङ्कुश्च तिष्ठत्वमरसंनिभः।
अनुयास्यन्ति चैतानि ज्योतींषि नृपसत्तमम्॥३२॥
कृतार्थं कीर्तिमन्तं च स्वर्गलोकगतं यथा।

भावार्थ :-
उनके ऐसा कहने पर सब देवता मुनिवर विश्वामित्र से बोले—’महर्षे! ऐसा ही हो ये सभी वस्तुएँ बनी रहें और आपका कल्याण हो। मुनिश्रेष्ठ! आपके रचे हुए अनेक नक्षत्र आकाश में वैश्वानर पथ से बाहर प्रकाशित होंगे और उन्हीं ज्योतिर्मय नक्षत्रों के बीच में सिर नीचा किये त्रिशंक भी प्रकाशमान रहेंगे। वहाँ इनकी स्थिति देवताओं के समान होगी और ये सभी नक्षत्र इन कृतार्थ एवं यशस्वी नृपश्रेष्ठ का स्वर्गीय पुरुष की भाँति अनुसरण करते रहेंगे’॥३०-३२ १/२॥

श्लोक:
विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा सर्वदेवैरभिष्टतः॥३३॥
ऋषिमध्ये महातेजा बाढमित्येव देवताः।

भावार्थ :-
इसके बाद सम्पूर्ण देवताओं ने ऋषियों के बीचमें ही महातेजस्वी धर्मात्मा विश्वामित्र मुनि की स्तुति की, इससे प्रसन्न होकर उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर देवताओं का अनुरोध स्वीकार कर लिया॥३३ १/२॥

श्लोक:
ततो देवा महात्मानो ऋषयश्च तपोधनाः।
जग्मुर्यथागतं सर्वे यज्ञस्यान्ते नरोत्तम॥३४॥

भावार्थ :-
नरश्रेष्ठ श्रीराम! तदनन्तर यज्ञ समाप्त होने पर सब देवता और तपोधन महर्षि जैसे आये थे, उसी प्रकार अपने-अपने स्थान को लौट गये॥३४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षष्टितमः सर्गः॥६०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में साठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥६०॥

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