वाल्मीकी रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ५३
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॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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AI वाल्मीकि रामायण
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AI बालकाण्ड सर्ग- ५३
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बालकाण्डम्
त्रिपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 53)
( विश्वामित्र का वसिष्ठ से उनकी कामधेनु को माँगना और उनका देने से अस्वीकार करना )
श्लोक:
एवमुक्ता वसिष्ठेन शबला शत्रुसूदन।
विदधे कामधुक् कामान् यस्य यस्येप्सितं यथा॥१॥
भावार्थ :-
‘शत्रुसूदन! महर्षि वसिष्ठ के ऐसा कहनेपर चितकबरे रंग की उस कामधेनु ने जिसकी जैसी इच्छा थी, उसके लिये वैसी ही सामग्री जुटा दी॥१॥
श्लोक:
इथून् मधूंस्तथा लाजान् मैरेयांश्च वरासवान्।
पानानि च महार्हाणि भक्ष्यांश्चोच्चावचानपि॥२॥
भावार्थ :-
‘ईख, मधु, लावा, मैरेय, श्रेष्ठ आसव, पानक रस आदि नाना प्रकार के बहुमूल्य भक्ष्य-पदार्थ प्रस्तुत कर दिये॥२॥
श्लोक:
उष्णाढ्यस्यौदनस्यात्र राशयः पर्वतोपमाः।
मृष्टान्यन्नानि सूपांश्च दधिकुल्यास्तथैव च॥३॥
भावार्थ :-
‘गरम-गरम भात के पर्वत के सदृश ढेर लग गये मिष्टान्न (खीर) और दाल भी तैयार हो गयी। दूध, दही और घीकी तो नहरें बह चलीं॥३॥
श्लोक:
नानास्वादुरसानां च खाण्डवानां तथैव च।
भोजनानि सुपूर्णानि गौडानि च सहस्रशः॥४॥
भावार्थ :-
‘भाँति-भाँति के सुस्वादु रस, खाण्डव तथा नाना प्रकार के भोजनों से भरी हुई चाँदी की सहस्रों थालियाँ सज गयीं॥४॥
श्लोक:
सर्वमासीत् सुसंतुष्टं हृष्टपुष्टजनायुतम्।
विश्वामित्रबलं राम वसिष्ठेन सुतर्पितम्॥५॥
भावार्थ :-
‘श्रीराम! महर्षि वसिष्ठ ने विश्वामित्रजी की सारी सेना के लोगों को भलीभाँति तृप्त किया। उस सेना में बहुत-से हृष्ट-पुष्ट सैनिक थे। उन सबको वह दिव्य भोजन पाकर बड़ा संतोष हुआ॥५॥
श्लोक:
विश्वामित्रो हि राजर्षिर्हृष्टपुष्टस्तदाभवत्।
सान्तःपुरवरो राजा सब्राह्मणपुरोहितः॥६॥
भावार्थ :-
‘राजर्षि विश्वामित्र भी उस समय अन्तःपुर की रानियों, ब्राह्मणों और पुरोहितों के साथ बहुत ही हृष्टपुष्ट हो गये॥६॥
श्लोक:
सामात्यो मन्त्रिसहितः सभृत्यः पूजितस्तदा।
युक्तः परमहर्षेण वसिष्ठमिदमब्रवीत्॥७॥
भावार्थ :-
‘अमात्य, मन्त्री और भृत्योंसहित पूजित हो वे बहुत प्रसन्न हुए और वसिष्ठजी से इस प्रकार बोले॥७॥
श्लोक:
पूजितोऽहं त्वया ब्रह्मन् पूजाहेण सुसत्कृतः।
श्रूयतामभिधास्यामि वाक्यं वाक्यविशारद॥८॥
भावार्थ :-
‘ब्रह्मन्! आप स्वयं मेरे पूजनीय हैं तो भी आपने मेरा पूजन किया, भलीभाँति स्वागत-सत्कार किया, बातचीत करने में कुशल महर्षे! अब मैं एक बात कहता हूँ, उसे सुनिये॥८॥
श्लोक:
गवां शतसहस्रेण दीयतां शबला मम।
रत्नं हि भगवन्नेतद रत्नहारी च पार्थिवः॥९॥
तस्मान्मे शबलां देहि ममैषा धर्मतो द्विज।
भावार्थ :-
‘भगवन्! आप मुझसे एक लाख गौएँ लेकर यह चितकबरी गाय मुझे दे दीजिये; क्योंकि यह गौ रत्नरूप है और रत्न लेने का अधिकारी राजा होता है। ब्रह्मन् ! मेरे इस कथनपर ध्यान देकर मुझे यह शबला गौ दे दीजिये; क्योंकि यह धर्मतः मेरी ही वस्तु है’॥९ १/२॥
श्लोक:
एवमुक्तस्तु भगवान् वसिष्ठो मुनिपुंगवः॥१०॥
विश्वामित्रेण धर्मात्मा प्रत्युवाच महीपतिम्।
भावार्थ :-
‘विश्वामित्र के ऐसा कहने पर धर्मात्मा मुनिवर भगवान् वसिष्ठ राजा को उत्तर देते हुए बोले-॥१० १/२॥
श्लोक:
नाहं शतसहस्रेण नापि कोटिशतैर्गवाम्॥११॥
राजन् दास्यामि शबलां राशिभी रजतस्य वा।
न परित्यागमयं मत्सकाशादरिंदम॥१२॥
भावार्थ :-
‘शत्रुओं का दमन करने वाले नरेश्वर! मैं एक लाख या सौ करोड़ अथवा चाँदी के ढेर लेकर भी बदले में इस शबला गौ को नहीं दूंगा। यह मेरे पास से अलग होने योग्य नहीं है॥११-१२॥
श्लोक:
शाश्वती शबला मह्यं कीर्तिरात्मवतो यथा।
अस्यां हव्यं च कव्यं च प्राणयात्रा तथैव च॥१३॥
भावार्थ :-
‘जैसे मनस्वी पुरुष की अक्षय कीर्ति कभी उससे अलग नहीं रह सकती, उसी प्रकार यह सदा मेरे साथ सम्बन्ध रखने वाली शबला गौ मुझसे पृथक् नहीं रह सकती। मेरा हव्य-कव्य और जीवन-निर्वाह इसी पर निर्भर है॥१३॥
श्लोक:
आयत्तमग्निहोत्रं च बलि.मस्तथैव च।
स्वाहाकारवषट्कारौ विद्याश्च विविधास्तथा॥१४॥
भावार्थ :-
‘मेरे अग्निहोत्र, बलि, होम, स्वाहा, वषट्कार और भाँति-भाँति की विद्याएँ इस कामधेनु के ही अधीन हैं॥१४॥
श्लोक:
आयत्तमत्र राजर्षे सर्वमेतन्न संशयः।
सर्वस्वमेतत् सत्येन मम तुष्टिकरी तथा॥१५॥
कारणैर्बहभी राजन् न दास्ये शबलां तव।
भावार्थ :-
‘राजर्षे! मेरा यह सब कुछ इस गौके ही अधीन है, इसमें संशय नहीं है, मैं सच कहता हूँ- यह गौ ही मेरा सर्वस्व है और यही मुझे सब प्रकार से संतुष्ट करने वाली है। राजन्! बहुत-से ऐसे कारण हैं, जिनसे बाध्य होकर मैं यह शबला गौ आपको नहीं दे सकता’॥१५ १/२॥
श्लोक:
वसिष्ठेनैवमुक्तस्तु विश्वामित्रोऽब्रवीत् तदा॥१६॥
संरब्धतरमत्यर्थं वाक्यं वाक्यविशारदः।
भावार्थ :-
‘वसिष्ठजी के ऐसा कहने पर बोलने में कुशल विश्वामित्र अत्यन्त क्रोधपूर्वक इस प्रकार बोले—॥१६ १/२॥
श्लोक:
हैरण्यकक्षप्रैवेयान् सुवर्णाङ्कशभूषितान्॥१७॥
ददामि कुञ्जराणां ते सहस्राणि चतुर्दश।
भावार्थ :-
‘मुने! मैं आपको चौदह हजार ऐसे हाथी दे रहा हूँ, जिनके कसने वाले रस्से, गले के आभूषण और अंकुश भी सोने के बने होंगे और उन सबसे वे हाथी विभूषित होंगे॥१७ १/२॥
श्लोक:
हैरण्यानां रथानां च श्वेताश्वानां चतुर्युजाम्॥१८॥
ददामि ते शतान्यष्टौ किंकिणीकविभूषितान्।
हयानां देशजातानां कुलजानां महौजसाम्।
सहस्रमेकं दश च ददामि तव सुव्रत॥१९॥
नानावर्णविभक्तानां वयःस्थानां तथैव च।
ददाम्येकां गवां कोटिं शबला दीयतां मम॥२०॥
भावार्थ :-
‘उत्तम व्रत का पालन करने वाले मुनीश्वर! इनके सिवा मैं आठ सौ सुवर्णमय रथ प्रदान करूँगा; जिनमें शोभा के लिये सोने के घुघुरू लगे होंगे और हर एक रथ में चार-चार सफेद रंग के घोड़े जुते हुए होंगे तथा अच्छी जाति और उत्तम देश में उत्पन्न महातेजस्वी ग्यारह हजार घोड़े भी आपकी सेवा में अर्पित करूँगा। इतना ही नहीं, नाना प्रकार के रंगवाली नयी अवस्था की एक करोड़ गौएँ भी दूंगा, परंतु यह शबला गौ मुझे दे दीजिये॥१८-२०॥
श्लोक:
यावदिच्छसि रत्नानि हिरण्यं वा द्विजोत्तम।
तावद् ददामि ते सर्वं दीयतां शबला मम॥२१॥
भावार्थ :-
‘द्विजश्रेष्ठ! इनके अतिरिक्त भी आप जितने रत्न या सुवर्ण लेना चाहें, वह सब आपको देनेके लिये मैं तैयार हूँ; किंतु यह चितकबरी गाय मुझे दे दीजिये’॥२१॥
श्लोक:
एवमुक्तस्तु भगवान् विश्वामित्रेण धीमता।
न दास्यामीति शबलां प्राह राजन् कथंचन॥२२॥
भावार्थ :-
‘बुद्धिमान् विश्वामित्र के ऐसा कहने पर भगवान् वसिष्ठ बोले- ’राजन्! मैं यह चितकबरी गाय तुम्हें किसी तरह भी नहीं दूंगा॥२२॥
श्लोक:
एतदेव हि मे रत्नमेतदेव हि मे धनम्।
एतदेव हि सर्वस्वमेतदेव हि जीवितम्॥२३॥
भावार्थ :-
‘यही मेरा रत्न है, यही मेरा धन है, यही मेरा सर्वस्व है और यही मेरा जीवन है॥२३॥
श्लोक:
दर्शश्च पौर्णमासश्च यज्ञाश्चैवाप्तदक्षिणाः।
एतदेव हि मे राजन् विविधाश्च क्रियास्तथा॥२४॥
भावार्थ :-
‘राजन्! मेरे दर्श, पौर्णमास, प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञ तथा भाँति-भाँति के पुण्यकर्म- यह गौ ही है। इसी पर ही मेरा सब कुछ निर्भर है॥२४॥
श्लोक:
अतोमूलाः क्रियाः सर्वा मम राजन् न संशयः।
बहुना किं प्रलापेन न दास्ये कामदोहिनीम्॥२५॥
भावार्थ :-
‘नरेश्वर! मेरे सारे शुभ कर्मों का मूल यही है, इसमें संशय नहीं है, बहुत व्यर्थ बात करने से क्या लाभ मैं इस कामधेनु को कदापि नहीं दूंगा’॥२५॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः॥५३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५३॥


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