निलावंती एक श्रापित ग्रंथ संपूर्ण कथा- 3

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निलावंती एक श्रापित ग्रंथ

मैं घर की तरफ जाने लगा जहाँ मेरी बीवी सोच रही होगी की उसका पति हर रोज तो दिन ढलने से पहले ही खेत से लौट आता है लेकिन आज ऐसा क्या हुआ की मध्यरात्री के बाद भी वह अभी तक नहीं आ पाया। शायद उसने बहुत देर तक मेरी राह देखी थी और वैसे ही दरवाजे के पास सो गई होगी। मेरा घर सुनसान इलाके में नहीं था। मेरे घर के आसपास भी थोड़ी दूरी पर कई घर बनाये हुये थे। लेकिन देहातों में लोग जल्दी सो जाते है तो दो चार कुत्तों के अलावा वहां कोई दिख नहीं रहा था। हालाँकि कुत्ते कोई नया इंसान दिखने पर भौंकते जरूर थे लेकिन मुझसे उनकी पहचान थी इसलिये वह हिले तक नहीं।

मैं अपने घर की तरफ बड़ता चला गया। उसने दरवाजा अंदर से बंद नहीं किया था। घर में कुछ था ही नहीं तो चोरो का कैसा डर। सिर्फ आगे धकेला हुआ था। मैंने सोचा यह अच्छा हुआ। अगर दरवाजा बंद होता तो बीवी जाग जाती जिससे सारा पासा पलट सकता था। बीच बीच में मुझे हैरानी भी हो रही थी की मैं इतना निर्दयी कैसे हो सकता हूँ जो किसी तांत्रिक के कहने पर अपनी बेगुनाह बीवी को बेवजह मार डाले। लेकिन यह मेरा दिमाग सोच रहा था शरीर की कृती इससे बिलकुल विपरीत। जैसे कोई और मेरे शरीर को चला रहा हो।

मैं दरवाजा धकेल कर अंदर गया तो वही पर मेरी बीवी सोती हुई दिख गई। मेरा दिमाग जोर जोर से चिल्लाने को चाहता था। मैं चाहता था की बीवी को चिल्लाकर उठा दूं और भाग जाने के लिये कहुँ। लेकिन मैं कुछ नहीं कर पाया। मैंने धीरे से छुरा और खोपड़ी बगल में रख दी अब मेरे हाथ बहुत सफाई से बीवी का गला घोट रहे थे। मेरी अभागी बीवी को आँखें खोलने तक का मौका नहीं मिला। वह छुटने के लिये बहुत छटपटाई लेकिन सिर्फ कुछ पल के लिये और फिर सब कुछ शांत हो गया। बाबु का मन बहुत व्याकुल हो गया लेकिन शरीर से वह वैसा ही निर्विकार था।

मैं अपने घर में थैला ढूँढने लगा जिसमें छुरा और खोपड़ी रख सकूँ। मुझे थैला मिल गया मैंने थैले में छुरा और खोपड़ी रखी। थैला कंधे पर लटका दिया। फिर धीरे से अपनी बीवी का शव उठाकर कंचे पर लिया और घर से बाहर आया। बाहर से कुंडी लगाकर घर बंद किया और श्मशान की ओर बढ़ा जहाँ वह तांत्रिक मेरी राह देख रहा था। श्मशान में पहुँचने के बाद मैंने अपनी बीवी का शव उस हवनकुंड के पास लिटा दिया और तांत्रिक को कहा की मैं उसकी गर्दन काटने का धैर्य नहीं कर पाया।

तांत्रिक ने कहा की वह यह काम खुद कर लेगा। तांत्रिक ने मुझे बैठने का इशारा किया और उसने दूसरी विधि प्रारंभ कर दी। उसने मेरी बीवी के शव की मांग भरी। हवनकुंड की अग्नी जब बहुत ज्यादा प्रज्वलित हो गई तो उसने बड़ी सफाई के साथ मेरी बीवी का सर धड़ से अलग कर दिया। खून की धारा बहने लगी जो तांत्रिक ने पहले से ही नीचे पकड़े इंसानी खोपड़ी में गिर रही थी क्योंकि उसे मरे ज्यादा देर नहीं हुई थी तो खून अभी भी गरम था।

जब खोपड़ी खून से पुरी भर गई तो तांत्रिक ने आधे से ज्यादा खून हवनकुंड में डाल दिया। थोड़ा खून जो बचा हुआ था वह उसे कुछ मंत्र बोलने के बाद घुट-घुट कर पीने लगा। मैं बिलकुल सुन्न हो गया। ऐसा अघोरी कृत्य मैंने कभी सपने में भी नहीं देखा था जैसा मेरी नजरो के सामने घट रहा था। तांत्रिक ने खुन पीने के बाद उसी छुरे से मेरी बीवी गले से नाभी तक एक चीरा लगाया और उसमें हाथ डाल कर दिल, ऑतें, गुर्दा आदि अंग निकाल निकाल कर उस अग्नि में डाल रहा था साथ ही भयानक आवाज में मंत्रों के उच्चार भी कर रहा था।

यह सब अगले एक घंटे तक चलता रहा जब मेरी बीवी के कपड़ों के अलावा कुछ नहीं बचा तब यह सब थम गया। अब श्मशान का सन्नाटा महसूस होने लगा था। कभी कभी चट चट आवाजें करती हवनकुंड की लकड़ियों की आवाज के अलावा कोई हलचल नहीं हो रही थी। अग्नि पहले से ज्यादा धु धु कर जल रहा था। तभी घना कोहरा छाने लगा लेकिन सिर्फ मेरे और तांत्रिक के आसपास जैसे एक घेरा बन रहा हो। हवनकुंड से एक भयानक पिशाच्च प्रकट हो गया उसने तांत्रिक से कहा की वह उसका कोई भी हुक्म मानेगा और पुछा की अभी उसे क्या करना है।

तांत्रिक ने कहा की फिलहाल उसको कुछ नहीं करना है लेकिन जब मैं बुलाऊँ तब उसे आना होगा। पिशाच्च ने ये बात मान ली और वह उसी तरह उस कोहरे में गायब हो गया जैसे वह आया था। तांत्रिक ने मुझसे कहा की हमें अब यहाँ से निकलना होगा क्योंकि थोड़ी ही देर में सूरज निकल जायेगा और यदि किसी ने हमें यहाँ देख लिया तो बहुत हंगामा हो जायेगा। तांत्रिक ने सारा सामान समेट लिया और मुझसे भी कहा की वह वहाँ मौजूद हर एक निशानी को मिटा दे जिससे वहाँ घटी घटनाओं के बारे में पता चल सकता हो। मैंने भी वही किया जो मुझसे कहा गया।

सब हो जाने के बाद तांत्रिक श्मशान के पीछे के रास्ते से निकलने लगा उसने मुझे भी अपने साथ आने के लिये कहा। हवनकुंड और बाकी सब तांत्रिक विधिओं की चीजे हटाने के बाद से ही में पहले जैसा बन गया था और डर से कांपने लगा था। मुझे समझ में आ गया की मेरे हाथ से कितना बड़ा गुनाह हुआ है। में तांत्रिक को पुछने लगा की मेरे साथ उसने क्या किया था लेकिन तांत्रिक ने जवाब दिया की अगर मैं उसके साथ चलूँ तो मुझे सब कुछ बता दिया जायेगा।

वैसे भी अब वहाँ पर रहना मेरे लिये अच्छा नहीं होता यही सोचकर मैं उसके साथ चल पड़ा। लगभग चार दिन तक सफर करने के बाद हम दोनों रात को उस खंडहर में पहुँचे जहाँ वह तांत्रिक रहता था। मैंने वहाँ पर देखा तो वहाँ भी वैसी ही अघोरी चीजें दिखाई दी जैसे श्मशान में थी। फर्क यह था की तब मैं उन सब का हिस्सा नहीं था लेकिन अब ना चाहते हुए भी वह मेरी जिंदगी में दाखिल हो चुकी थी। यह मेरी भविष्य का हिस्सा बनने वाली थी। हम दोनों ही बहुत थक चुके थे हालाकी हमने बीच-बीच में रूक कर थोड़ा सा आराम किया था लेकिन वह हमारी थकान दूर करने के लिये काफी नहीं था। इसलिये आते ही तांत्रिक और में दोनों सो गये।

सूरज माथे पर आया तब जाकर तांत्रिक की आँखें खुली वह उठा और साथ में मुझे भी उठाया। हम दोनों नदी पर जाकर स्नान करके आये। हम दोनों को भूख भी बहुत लगी थी क्योंकि चार दिनों से बहुत थोडा अन्न पेट में गया था। लेकिन वहाँ पर ना चूल्हा था ना भोजन की और कोई व्यवस्था। लगता था की तांत्रिक वहाँ से कई महीनों के लिये बाहर आया था। तभी तांत्रिक ने जोर से पुकारा ‘सुलेमान’। चार दिन पहले अमावस की रात को एक स्त्री की बली देकर जिस पिशाच्च को वश किया था वही पिशाच्च आगे आकर खड़ा हो गया और पुछने लगा की उसके लिये क्या आदेश है।

तांत्रिक ने उसे सबसे अच्छा खाना और पीने के लिये महंगे से महंगे पेय लाने के लिये कहा। पिशाच्च ने सिर्फ चुटकी बजाई और जिन चीजों की माँग की गई थी वह चीजे सामने थी। यह देखकर मेरी आँखें खुली की खुली रह गई। मैं समझ गया की क्यों तांत्रिक ने इसे वश करने के लिये इतनी मुसीबत मोल ली थी। वह कोई भी इच्छा पूर्ण कर सकता था। हम दोनों ने भरपेट खाना खाया और साथ में शरबत, ठंडाई का भी स्वाद लिया। मैंने तांत्रिक को याद दिलाया की उसने साथ चलने पर सब कुछ बताने का वादा किया था।

तब तांत्रिक ने बताना शुरू किया। “मेरा जन्म कहा हुआ था यह तो मुझे याद नहीं है लेकिन मुझे एक अघोरी ने पाला था जिसका नाम चंद्राबाबु था। अघोरी वह तांत्रिक जमात होती है जो नरमांस का भक्षण करते है। क्योंकि मैं अघोरी के साथ रहता था इसलिये हर कोई मुझसे डरता था। वैसे मेरा कोई नाम नहीं रखा गया था लेकिन चंद्राबाबु मुझको कन्नम कहकर पुकारता था। बचपन से ही नरबली और पशुबली को देखते देखते मेरी जैसे आत्मा मर गई थी। उस अघोरी के साथ रहने से मैं भी अघोरी ही बन गया था। मरने से पहले चंद्राबाबु ने मुझको पिशाच्च वश करने की विधि बताई और कहा की।

यदि किसी भी तरह से तुम्हारा गुजारा ना चले तभी पिशाच्च वश करने की सोचना तब तक नही। क्योंकि पिशाच्च वश करने के लिये तुम्हें वह करना पड़ेगा जो आज तक तुमने कभी नहीं किया। किसी गाव की श्मशानभुमी मे जाकर पहले बकरे, कुत्ते और मुर्गे की बली चढानी होगी और फिर किसी बाँझ स्त्री की उसी के पति के माध्यम से बली चढ़ानी होगी। यदि तुम इसमें सफल हुए तो पिशाच्च वश हो जायेगा और तुम्हारी हर एक इच्छा पुरी करेगा। उस पिशाच्च को हमेशा के लिये अपने हुक्म में रखने के लिये हर अमावस को तुम्हें एक बच्चे की बली चढ़ानी होगी। तभी वह तुम्हारा हर एक हुक्म मानेगा नहीं तो तुम्हारी बली लेकर वह फिर से अदृश्य हो जायेगा। यह कहकर चंद्राबाबु ने घंटे भर बाद आखरी साँस ली।

शेष कथा अगले लेख में….

नोट:- यदि आपने यह लेख यहाॅ॑ तक पढ़ा है इसका अर्थ है कि आप इसे एक निस्वार्थ भाव से पढ़ रहे है। यह एक शापित ग्रंथ है परंतु निस्वार्थभाव से पढ़ने वाले मनुष्य को इसका कोई भी दुष्प्रभाव नहीं पड़ता कृपया इसकी आगे की कथा भी आपने निस्वार्थभाव से ही पढ़े यह आपके लिए आवश्यक है।

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