जीवात्मा का कर्म लोक की यात्रा, शिव का उपदेश और श्राप
जीवात्मा का कर्म लोक की यात्रा
इस कथा का आरंभ हम एक जीवात्मा और ब्रह्मा से करते हैं। जो कल्याण हेतु प्रथम बार मनुष्य योनि में प्रवेश करने जा रहा हैं। और ब्रह्मा जी से अपने कर्म और धर्म चक्र, जन्म-मरण का चक्र, आत्म-ज्ञान और मोक्ष प्राप्त के विषय में ज्ञान अर्जित करता हैं।
नोट: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुल 84 लाख(84,00,000) योनियां होती हैं, जिनमें आत्मा जन्म लेती है; यह संख्या विभिन्न जीवों (जलचर, पक्षी, कीड़े, पशु, पेड़-पौधे और मनुष्य) के प्रकारों को दर्शाती है, जिसमें मनुष्य योनि को विशेष माना जाता है, जिसके बाद मोक्ष या उच्चतर योनि की प्राप्ति हो सकती है, और इन योनियों को जलज, स्थावर, कृमि, पक्षी, थलचर और मनुष्य श्रेणियों में बांटा गया है।
84 लाख योनियों का विभाजन (पद्म पुराण के अनुसार):
- 9 लाख योनियां जल में रहने वाले जीवों (जलचर) की हैं।
- 20 लाख योनियां पेड़-पौधों (स्थावर) की हैं।
- 11 लाख योनियां कीड़े-मकोड़ों (कृमि) की हैं।
- 10 लाख योनियां पक्षियों (नभचर) की हैं।
- 30 लाख योनियां भूमि पर रहने वाले अन्य जीवों (स्थलीय) की हैं।
- 4 लाख योनियां मनुष्य की हैं।
योनियों के प्रकार (जन्म के आधार पर):
- जरायुज: जो माता के गर्भ से जन्म लेते हैं (मनुष्य, पशु).
- अंडज: जो अंडों से उत्पन्न होते हैं (पक्षी, सरीसृप).
- स्वेदज: जो पसीना, मल-मूत्र आदि से उत्पन्न होते हैं (कीड़े, सूक्ष्मजीव).
- उद्भिज्ज: जो भूमि से उत्पन्न होते हैं (पेड़-पौधे).
ब्रह्मा उवाच- इस त्रिलोक में समस्त जीवात्मा शिव का ही अंश हैं। क्योंकि देव या मनुष्य अपने प्रयासों से जो नहीं कर सकते, वह भगवान शिव अपनी कृपा से कर सकते हैं। भगवान शिव सृष्टि के आरंभ (आदि) और अंत (अंत) दोनों हैं, वे शाश्वत, सर्वव्यापी और अनंत हैं, जिनका न कोई आदि है और न कोई अंत, वे ही समय, काल और महाकाल हैं, और कण-कण में विराजमान हैं। क्योंकि कर्ता करे न कर सके, शिव जो करे सो होय। तीन लोक नौ खंड में, शिव से बड़ा न कोय।
जीवात्मा उवाच- हे जन्मदाता कृपया मुझे- कर्म और धर्म चक्र, जन्म-मरण का चक्र, आत्म-ज्ञान और मोक्ष प्राप्त के संदर्भ में शिव द्वारा कहे गए बचनों को विस्तार पूर्वक बताएं!
ब्रह्मा उवाच- शिव जी द्वारा कहे गए बचनों के अनुसार जब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप- “मैं आत्मा हूँ” – को पहचान लेता है, तब जन्म-मरण का चक्र, कर्म-बंधन, और मानसिक क्लेश धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं। यही अवस्था मोक्ष कहलाती है। कर्म और धर्म चक्र, आत्म-ज्ञान और मोक्ष उस पथ का नाम है जहाँ मनुष्य:
- अपने भीतर की दिव्यता को पहचानता है,
- दूसरों को दुःख न देने का संकल्प लेता है,
- शांति में जीता है,
- प्रेम और दया को जीवन का आधार बनाता है,
- और अंत में अपने वास्तविक स्वरूप को अनुभव कर लेता है।
- जब आत्मा स्वयं को जान लेती है। तब वह सभी बंधनों से मुक्त होकर अपने स्रोत- परमात्मा- की ओर लौट जाती है।
जीवात्मा उवाच- मोक्ष क्या हैं, यह कैसे मिलता है। इसके संदर्भ में शिव द्वारा कहे गए बचनों को विस्तार पूर्वक बताएं!
ब्रह्मा उवाच- मोक्ष कोई स्थान नहीं, कोई स्वर्ग या लोक नहीं, बल्कि आत्मा का अपने स्वरूप को पहचान लेना है। मोक्ष का अर्थ केवल मृत्यु के बाद किसी स्वर्ग में जाना नहीं है। मोक्ष वह अवस्था है जहाँ मनुष्य अपने भीतर छिपे हुए सत्य को पहचानता है और सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है। यह जीवन की सबसे ऊँची, सबसे शांत, और सबसे सुंदर उपलब्धि है मोक्ष कोई दूर की बात नहीं है। यह हमारे भीतर, हमारे ही अनुभव में, हमारे मन की शांति और पवित्रता में छिपा है।
मोक्ष वही है।
जहाँ मनुष्य स्वयं को पहचान ले- “मैं शरीर नहीं, मैं नश्वर नहीं, मैं शुद्ध, अजर, अमर आत्मा हूँ”।
जीवन को समझ ले- क्योंकि यह संसार सुखों का घर नहीं- अनुभवों का विद्यालय है।
और मृत्यु को मुस्कुराकर स्वीकार ले- तो उसी क्षण उसके भीतर जन्म–मरण का भय समाप्त हो जाता है। यह ज्ञान ही मोक्ष का द्वार है। यही मानव जन्म का अंतिम लक्ष्य है। यही परम सत्य है। और यही मोक्ष है।
जीवात्मा उवाच- जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य को कैसे- कर्म करने चाहिए, गुण होने चाहिए और जीवन जीना चाहिए। कृपया इसके संदर्भ में शिव द्वारा कहे गए बचनों को विस्तार पूर्वक बताएं!
ब्रह्मा उवाच- जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य को कैसे- कर्म, गुण और जीवन जीना चाहिए- इसका शिव जी द्वारा कहे गए एक स्पष्ट, सुंदर और जीवनभर के लिए मार्गदर्शन को विस्तार पूर्वक कह रहा हूँ। यह धर्म-शास्त्र, अध्यात्म और व्यवहार- तीनों का संतुलित सार है।
जन्म से मृत्यु तक मनुष्य का आदर्श जीवन–मार्ग
1. बाल्यावस्था (0–15 वर्ष)
गुण: पवित्रता, सरलता, सीखने की इच्छा, अनुशासन: बच्चे के मन में ईश्वर, सत्य, दया, नम्रता और शिष्टाचार के बीज डालने का समय।
कर्म:
- माता–पिता और गुरु की आज्ञा का पालन
- अच्छे संस्कार सीखना
- बुरी आदतों से दूर रहना
- पढ़ाई में मन लगाना
- प्रकृति व जीवों से प्रेम करना
👉 यह उम्र “गुणों को बोने” की होती है।
2. किशोरावस्था (16–25 वर्ष)
गुण: आत्मनियंत्रण, संयम, साहस, लक्ष्य
यह अवस्था मनुष्य के चरित्र और दिशा को तय करती है।
कर्म:
- संयमित जीवन (भोजन, मित्र, मनोरंजन)
- शिक्षा पर ध्यान
- शरीर और मन को स्वस्थ रखना
- बुरी संगति से बचना
- कठिनाई में भी सत्य मार्ग न छोड़ना
- करियर/लक्ष्य बनाना
- योग/ध्यान, अच्छे ग्रंथों से जुड़ना
👉 यह उम्र “स्वभाव और लक्ष्य बनाने” की होती है।
3. युवावस्था (25–50 वर्ष)
गुण: परिश्रम, निष्ठा, प्रेम, जिम्मेदारी, संतुलन
सबसे ऊर्जावान और निर्माण करने वाली उम्र।
कर्म:
- परिवार की जिम्मेदारी निभाना
- सत्य और नैतिकता के अनुसार कमाना
- पत्नी/पति, माता-पिता, बच्चों का सम्मान
- समाज में सहयोग, सेवा
- सफलता में विनम्रता और असफलता में धैर्य
- धन कमाना लेकिन अहंकार, लोभ से दूर
- क्रोध, ईर्ष्या, तुलना से बचना
👉 यह उम्र “कर्म, सेवा और जिम्मेदारी निभाने” की है।
4. परिपक्व अवस्था (50–70 वर्ष)
गुण: ज्ञान, समता, वैराग्य, क्षमा, संतोष
अब मनुष्य को धीरे-धीरे संसार से वैराग्य अपनाकर आध्यात्मिकता की ओर बढ़ना चाहिए।
कर्म:
- परिवार को मार्गदर्शन देना
- अनावश्यक इच्छाएँ कम करना
- सेवा, दान, सत्संग, धर्म की ओर झुकाव
- योग–ध्यान, आध्यात्मिक अध्ययन
- पिछले कर्मों का परीक्षण (अहंकार, दोष दूर करना)
- समाज और बच्चों को जीवन-संदेश देना
- शांत रहकर जीवन जीना
👉 यह उम्र “ज्ञान और आत्मचिन्तन” की है।
5. वृद्धावस्था (70+ वर्ष)
गुण: समर्पण, शांति, क्षमा, संतोष, स्नेह
अब संसार का मोह पूरी तरह कम कर आत्मा का चिंतन करना चाहिए।
कर्म:
- अधिक समय जप, ध्यान, सत्संग में
- क्षमा और प्रेमभाव बढ़ाना
- मृत्यु को शांति से स्वीकारना
- परिवार को आशीर्वाद देना
- सरल जीवन – कम बोलना, कम क्रोध, मन शांत रखना
- आत्मचिंतन –
“मैं आया क्यों? मैंने क्या सीखा? अब कहाँ जाना है?”
👉 यह उम्र “अंतिम मुक्ति की तैयारी” की है।
मनुष्य को पूरे जीवन में कौन-से गुण अपनाने चाहिए?
- सत्य – हर स्थिति में सत्य भाषा, सत्य व्यवहार
- अहिंसा – किसी को भी शब्द, कर्म या विचार से चोट न पहुँचाना
- दया – मन का कोमल और करुणामय होना
- क्षमा – जल्दी रुसने और देर तक गुस्सा रखने की आदत छोड़ना
- नम्रता – विनम्र व्यवहार
- संयम – इन्द्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण
- श्रम – परिश्रम से पीछे न हटना
- संतोष – जितना मिले, उसका आभार
- सेवा – दूसरों की मदद करना
- वैराग्य – भोग में लिप्त न होकर जीवन का उच्च लक्ष्य देखना
मनुष्य का जीवन 4 स्तंभों पर चलता है–
- ज्ञान (बुद्धि की शुद्धि)
- कर्म (कर्तव्य और सेवा)
- भक्ति (समर्पण और प्रेम)
- वैराग्य (आसक्ति का कम होना)
जो व्यक्ति इन चारों का संतुलन रखता है, वह जन्म से मृत्यु तक पवित्र, सुखी और अंत में मोक्ष प्राप्त करता है।
जीवात्मा उवाच- हे जन्मदाता अब मुझे भली-भांति कर्म और धर्म चक्र, जन्म-मरण का चक्र, आत्म-ज्ञान और मोक्ष प्राप्त का ज्ञान हो चला है। कृपया कर शिव जी द्वारा कहे गए उन बचनों को भी बताएं जिसे मैंने अज्ञानता बस आपसे पुछना भुल गया।
ब्रह्मा उवाच- अज्ञानता ही 84 लाख योनियों का भ्रमण कराती है, जन्म से लेकर मृत्यु तक अज्ञानता साथ नहीं छोड़ती, सब कुछ ज्ञात हो जानें के उपरान्त भी अज्ञानता सदैव साथ रहती हैं।
अज्ञानता ही शिव जी द्वारा दिया गया श्राप है, तभी तो पुर्व जन्म की यात्रा के उपरान्त किया गया कोई भी कर्म(पाप और पुण्य), और बातें स्मरण नहीं रहती। और यदि ज्ञान प्राप्त हो जाएं तब जन्म-मरण का चक्र, कर्म-बंधन सब कुछ टूट जाता है और वहीं जीवात्मा पुनः शिव में समा जाता हैं।
ॐ नमः शिवाय, हर हर महादेव
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