मृत्यु के बाद मृतक की आत्मा आखिर किस दिन अपने घर लौटती है?

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मृत्यु के बाद मृतक की आत्मा

दोस्तों जीवन और मृत्यु एक अटल सत्य है जिसे कभी झुठलाया नहीं जा सकता है जो आया है उसे जाना ही होगा। हम सभी इस संसार में मोह और माया रुपी बंधनों में बंधे हुए हैं। अपनों का मोह, धन दौलत का मोह, कुछ पाने की इच्छा, कुछ करने की इच्छा, हमारे मन मे सदैव बनी रहती है। हम चाह कर भी इन सब से दूर नहीं भाग सकते, क्योंकि यह जीवन का चक्र है। परन्तु एक दिन यही चक्र टूट जाता हैं, और मनुष्य अपने मोह और मायारूपी शरीर को छोड़ देता है। या यूं कहें की उसकी मृत्यु हो जाती है।

गरुड़ पुराण के अनुसार

गरुड़ पुराण में कहा गया है कि जब किसी इंसान की मृत्यु होती है, तो उसकी आत्मा तुरंत और पूरी तरह से इस दुनिया से नहीं जाती। कई दिनों तक, मृतक की आत्मा अपने परिवार और घर के आस-पास ही घूमती रहती है। अपने परिवार के सदस्यों, अपने दोस्तों, अपने रिश्तेदारों, और सगे संबंधियों के पास जाती है, छटपटाती है, रोती है, उनसे बात करना चाहती हैं।

लेकिन जब कोई उनकी बात नहीं सुनता तो वह परेशान हो कर इधर-उधर भागने लगतीं है, कभी अपने रूम में जाती है, घर की चीजों को छूने की कोशिश करती हैं, परेशान होती हैं, जोर-जोर से रोती है, चिल्लाती है, फिर से अपने परिजनों के पास जाती है। उन्हें गले लगाने की कोशिश करती है, अंत में सब-कुछ करने के उपरांत परेशान होकर दूर एक कोने में जाकर बैठ जाती है। तब धीरे-धीरे उसे अपनी मृत्यु का अहसास होता है।

इसी वजह से, हिन्दू परंपरा में मौत के बाद कई खास रस्में और नियम बताए गए हैं। माना जाता है कि इन नियमों को मानने से मृतक की आत्मा को शांति मिलती है और यह पक्का होता है कि परिवार अपने पूर्वजों के आशीर्वाद में बना रहे।

पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, मौत के बाद तेरहवें दिन का खास महत्व होता है। कहा जाता है कि इस दिन, आत्मा आखिरी बार जाने से पहले अपने घर और प्रियजनों से मिलती है। इसलिए, इस तेरहवें दिन पूजा-पाठ, पिंड-दान (पितृ तर्पण) और ब्राह्मणों को भोजन कराने जैसी रस्में की जाती हैं।

बहुत से लोग मानते हैं कि इस दिन, पूर्वज अपने परिवार को देखने के लिए लौटते हैं। इसीलिए घर में शांत और पवित्र माहौल बनाए रखने की सलाह दी जाती है। परिवार के सदस्यों को इस दिन झगड़ा करने, गुस्से में आने या गाली-गलौज करने से बचने की सलाह दी जाती है।

आत्मा का लगाव बढ़ सकता हैं

यह भी माना जाता है कि तेरहवें दिन तक आत्मा अपने सांसारिक जीवन से जुड़े लोगों और जगहों से खुद को अलग करने की प्रक्रिया में होती है। इसलिए, इस दौरान परिवार के सदस्यों को कुछ खास बातों पर पूरा ध्यान देने की सलाह दी जाती है। कहा जाता है कि घर में गंदगी या अव्यवस्था जमा नहीं होने देनी चाहिए और पूजा की जगह को साफ-सुथरा रखना चाहिए।

रात में अकेले में रोना या बार-बार मरे हुए इंसान को पुकारना भी गलत माना जाता है। कुछ धार्मिक जानकारों के अनुसार, ऐसा करने से आत्मा का लगाव बढ़ सकता है और उसे शांति मिलना मुश्किल हो सकता है।

पितृ पक्ष और श्राद्ध कर्म

पितृ पक्ष और श्राद्ध कर्म के दौरान पितरों का सम्मान बहुत ज़रूरी माना जाता है। लोगों का मानना है कि अगर परिवार के सदस्य श्रद्धा और नियमों का पालन करते हुए अपने श्राद्ध कर्म को करते हैं, तो पितरों को खुशी मिलती है। हालांकि, अनादरपूर्ण व्यवहार को अशुभ माना जाता है। साथ ही, तेरहवें दिन, एक दीया जलाया जाता है और मरे हुए इंसान की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है। यह परिवार की आस्था और परंपरा का हिस्सा है।

हालांकि इन बातों को धार्मिक मान्यताओं और विश्वासों के तौर पर देखा जाता है, लेकिन परंपराएं अलग-अलग इलाकों और परिवारों में अलग-अलग हो सकती हैं। कुछ लोग इन्हें पूरी श्रद्धा से मानते हैं, जबकि दूसरे इन्हें सिर्फ़ एक सांस्कृतिक रिवाज़ मानते हैं। हालांकि, एक बात आम तौर पर मानी जाती है: पितरों का सम्मान करना और उनके लिए प्रार्थना करना परिवार की परंपरा और हमारे मूल्यों का हिस्सा है।

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