॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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AI बालकाण्ड सर्ग- ५१-६०
वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ५१
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बालकाण्डम्
एकपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 51)
( शतानन्द को अहल्या के उद्धार का समाचार बताना,शतानन्द द्वारा श्रीराम का अभिनन्दन करते हुए विश्वामित्रजी के पूर्वचरित्र का वर्णन )
श्लोक:
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रस्य धीमतः।
हृष्टरोमा महातेजाः शतानन्दो महातपाः॥१॥
भावार्थ :-
परम बुद्धिमान् विश्वामित्रजी की वह बात सुनकर महातेजस्वी महातपस्वी शतानन्दजी के शरीर में रोमाञ्च हो आया॥१॥
श्लोक:
गौतमस्य सुतो ज्येष्ठस्तपसा द्योतितप्रभः।
रामसंदर्शनादेव परं विस्मयमागतः॥२॥
भावार्थ :-
वे गौतम के ज्येष्ठ पुत्र थे तपस्या से उनकी कान्ति प्रकाशित हो रही थी वे श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन मात्र से ही बड़े विस्मित हुए॥२॥
श्लोक:
एतौ निषण्णौ सम्प्रेक्ष्य शतानन्दो नृपात्मजौ।
सुखासीनौ मुनिश्रेष्ठं विश्वामित्रमथाब्रवीत्॥३॥
भावार्थ :-
उन दोनों राजकुमारों को सुखपूर्वक बैठे देख शतानन्दने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रजी से पूछा-॥३॥
वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ५२
बालकाण्डम्
द्विपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 52)
( महर्षि वसिष्ठ द्वारा विश्वामित्र का सत्कार और कामधेनु को अभीष्ट वस्तुओं की सृष्टि करने का आदेश )
श्लोक:
तं दृष्ट्वा परमप्रीतो विश्वामित्रो महाबलः।
प्रणतो विनयाद वीरो वसिष्ठं जपतां वरम्॥१॥
भावार्थ :-
‘जप करनेवालों में श्रेष्ठ वसिष्ठ का दर्शन करके महाबली वीर विश्वामित्र बड़े प्रसन्न हुए और विनयपूर्वक उन्होंने उनके चरणों में प्रणाम किया॥१॥
श्लोक:
स्वागतं तव चेत्युक्तो वसिष्ठेन महात्मना।
आसनं चास्य भगवान् वसिष्ठो व्यादिदेश ह॥२॥
भावार्थ :-
‘तब महात्मा वसिष्ठ ने कहा—’राजन्! तुम्हारा स्वागत है।’ ऐसा कहकर भगवान् वसिष्ठ ने उन्हें बैठने के लिये आसन दिया॥२॥
श्लोक:
उपविष्टाय च तदा विश्वामित्राय धीमते।
यथान्यायं मुनिवरः फलमूलमुपाहरत्॥३॥
भावार्थ :-
‘जब बुद्धिमान् विश्वामित्र आसन पर विराजमान हुए, तब मुनिवर वसिष्ठ ने उन्हें विधिपूर्वक फलमूल का उपहार अर्पित किया॥३॥
वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ५३
बालकाण्डम्
त्रिपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 53)
( विश्वामित्र का वसिष्ठ से उनकी कामधेनु को माँगना और उनका देने से अस्वीकार करना )
श्लोक:
एवमुक्ता वसिष्ठेन शबला शत्रुसूदन।
विदधे कामधुक् कामान् यस्य यस्येप्सितं यथा॥१॥
भावार्थ :-
‘शत्रुसूदन! महर्षि वसिष्ठ के ऐसा कहनेपर चितकबरे रंग की उस कामधेनु ने जिसकी जैसी इच्छा थी, उसके लिये वैसी ही सामग्री जुटा दी॥१॥
श्लोक:
इथून् मधूंस्तथा लाजान् मैरेयांश्च वरासवान्।
पानानि च महार्हाणि भक्ष्यांश्चोच्चावचानपि॥२॥
भावार्थ :-
‘ईख, मधु, लावा, मैरेय, श्रेष्ठ आसव, पानक रस आदि नाना प्रकार के बहुमूल्य भक्ष्य-पदार्थ प्रस्तुत कर दिये॥२॥
श्लोक:
उष्णाढ्यस्यौदनस्यात्र राशयः पर्वतोपमाः।
मृष्टान्यन्नानि सूपांश्च दधिकुल्यास्तथैव च॥३॥
भावार्थ :-
‘गरम-गरम भात के पर्वत के सदृश ढेर लग गये मिष्टान्न (खीर) और दाल भी तैयार हो गयी। दूध, दही और घीकी तो नहरें बह चलीं॥३॥
वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ५४
बालकाण्डम्
चतुःपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 54)
( विश्वामित्र का वसिष्ठजी की गौ को बलपूर्वक ले जाना, गौका दुःखी होकर वसिष्ठजी से इसका कारण पूछना, विश्वामित्रजी की सेना का संहार करना )
श्लोक:
कामधेनुं वसिष्ठोऽपि यदा न त्यजते मुनिः।
तदास्य शबलां राम विश्वामित्रोऽन्वकर्षत॥१॥
भावार्थ :-
‘श्रीराम! जब वसिष्ठ मुनि किसी तरह भी उस कामधेनु गौको देने के लिये तैयार न हुए, तब राजा विश्वामित्र उस चितकबरे रंग की धेनु को बलपूर्वक घसीट ले चले॥१॥
श्लोक:
नीयमाना तु शबला राम राज्ञा महात्मना।
दुःखिता चिन्तयामास रुदन्ती शोककर्शिता॥२॥
भावार्थ :-
‘रघुनन्दन! महामनस्वी राजा विश्वामित्र के द्वारा इस प्रकार ले जायी जाती हुई वह गौ शोकाकुल हो मन-ही-मन रो पड़ी और अत्यन्त दुःखित हो विचार करने लगी- ॥२॥
श्लोक:
परित्यक्ता वसिष्ठेन किमहं सुमहात्मना।
याहं राजभृतैर्दीना ह्रियेय भृशदुःखिता॥३॥
भावार्थ :-
‘अहो! क्या महात्मा वसिष्ठ ने मुझे त्याग दिया है, जो ये राजा के सिपाही मुझ दीन और अत्यन्तदुःखिया गौ को इस तरह बलपूर्वक लिये जा रहे हैं?॥३॥
वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ५५
बालकाण्डम्
पञ्चपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 55)
( अपने सौ पुत्रों और सारी सेना के नष्ट हो जाने पर विश्वामित्र का तपस्या करके दिव्यास्त्र पाना, वसिष्ठजी का ब्रह्मदण्ड लेकर उनके सामने खड़ा होना )
श्लोक:
ततस्तानाकुलान् दृष्ट्वा विश्वामित्रास्त्रमोहितान्।
वसिष्ठश्चोदयामास कामधुक् सृज योगतः॥१॥
भावार्थ :-
‘विश्वामित्र के अस्त्रों से घायल होकर उन्हें व्याकुल हुआ देख वसिष्ठजी ने फिर आज्ञा दी- ’कामधेनो! अब योग बल से दूसरे सैनिकों की सृष्टि करो’॥१॥
श्लोक:
तस्या हुंकारतो जाताः काम्बोजा रविसंनिभाः।
ऊधसश्चाथ सम्भूता बर्बराः शस्त्रपाणयः॥२॥
भावार्थ :-
‘तब उस गौ ने फिर हुंकार किया उसके हुंकार से सूर्य के समान तेजस्वी काम्बोज उत्पन्न हुए थन से शस्त्रधारी बर्बर प्रकट हुए॥२॥
श्लोक:
योनिदेशाच्च यवनाः शकृद्देशाच्छकाः स्मृताः।
रोमकूपेषु म्लेच्छाश्च हारीताः सकिरातकाः॥३॥
भावार्थ :-
‘योनि देश से यवन और शकृद्देश (गोबर के स्थान) से शक उत्पन्न हुए। रोमकूपों से म्लेच्छ, हारीत और किरात प्रकट हुए॥३॥
वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ५६
बालकाण्डम्
पञ्चपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 56)
( विश्वामित्र द्वारा वसिष्ठजी पर नाना प्रकार के दिव्यास्त्रों का प्रयोग,वसिष्ठ द्वारा ब्रह्मदण्ड से ही उनका शमन,विश्वामित्र का ब्राह्मणत्व की प्राप्ति के लिये तप करने का निश्चय )
श्लोक:
एवमुक्तो वसिष्ठेन विश्वामित्रो महाबलः।
आग्नेयमस्त्रमुद्दिश्य तिष्ठ तिष्ठति चाब्रवीत्॥१॥
भावार्थ :-
वसिष्ठजी के ऐसा कहने पर महाबली विश्वामित्र आग्नेयास्त्र लेकर बोले-‘अरे खड़ा रह, खड़ा रह’॥१॥
श्लोक:
ब्रह्मदण्डं समुद्यम्य कालदण्डमिवापरम्।
वसिष्ठो भगवान् क्रोधादिदं वचनमब्रवीत्॥२॥
भावार्थ :-
उस समय द्वितीय कालदण्ड के समान ब्रह्मदण्ड को उठाकर भगवान् वसिष्ठ ने क्रोधपूर्वक इस प्रकार कहा-॥२॥
श्लोक:
क्षत्रबन्धो स्थितोऽस्म्येष यद् बलं तद् विदर्शय।
नाशयाम्यद्य ते दर्प शस्त्रस्य तव गाधिज॥३॥
भावार्थ :-
‘क्षत्रियाधम! ले, यह मैं खड़ा हूँ तेरे पास जो बल हो, उसे दिखा। गाधिपुत्र! आज तेरे अस्त्रशस्त्रों के ज्ञान का घमंड मैं अभी धूल में मिला दूंगा॥३॥
वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ५७
बालकाण्डम्
सप्तपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 57)
( विश्वामित्र की तपस्या, राजा त्रिशंकु का यज्ञ के लिये वसिष्ठजी से प्रार्थना करना,उनके इन्कार करने पर उन्हीं के पुत्रों की शरण में जाना )
श्लोक:
ततः संतप्तहृदयः स्मरन्निग्रहमात्मनः।
विनिःश्वस्य विनिःश्वस्य कृतवैरो महात्मना॥१॥
स दक्षिणां दिशं गत्वा महिष्या सह राघव।
तताप परमं घोरं विश्वामित्रो महातपाः॥२॥
भावार्थ :-
श्रीराम! तदनन्तर विश्वामित्र अपनी पराजय को याद करके मन-ही-मन संतप्त होने लगे। महात्मा वसिष्ठ के साथ वैर बाँधकर महातपस्वी विश्वामित्र बारम्बार लम्बी साँस खींचते हुए अपनी रानी के साथ दक्षिण दिशा में जाकर अत्यन्त उत्कृष्ट एवं भयंकर तपस्या करने लगे॥१-२॥
श्लोक:
फलमूलाशनो दान्तश्चचार परमं तपः।
अथास्य जज्ञिरे पुत्राः सत्यधर्मपरायणाः॥३॥
हविष्पन्दो मधुष्पन्दो दृढनेत्रो महारथः।
भावार्थ :-
वहाँ मन और इन्द्रियों को वश में करके वे फलमूल का आहार करते तथा उत्तम तपस्या में लगे रहते थे। वहीं उनके हविष्पन्द, मधुष्पन्द, दृढनेत्र और महारथ नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए, जो सत्य और धर्म में तत्पर रहने वाले थे॥३ १/२॥
वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ५८
बालकाण्डम्
अष्टपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 58)
( वसिष्ठ ऋषि के पुत्रों का त्रिशंकु को शाप-प्रदान, उनके शाप से चाण्डाल हुए त्रिशंकु का विश्वामित्रजी की शरण में जाना )
श्लोक:
ततस्त्रिशङ्कोर्वचनं श्रुत्वा क्रोधसमन्वितम्।
ऋषिपुत्रशतं राम राजानमिदमब्रवीत्॥१॥
प्रत्याख्यातोऽसि दुर्मेधो गुरुणा सत्यवादिना।
तं कथं समतिक्रम्य शाखान्तरमुपेयिवान्॥२॥
भावार्थ :-
रघुनन्दन! राजा त्रिशंकु का यह वचन सुनकर वसिष्ठ मुनि के वे सौ पुत्र कुपित हो उनसे इस प्रकार बोले- ‘दुर्बुद्धे! तुम्हारे सत्यवादी गुरु ने जब तुम्हें मना कर दिया है, तब तुमने उनका उल्लङ्घन करके दूसरी शाखा का आश्रय कैसे लिया?॥१-२॥
श्लोक:
इक्ष्वाकूणां हि सर्वेषां पुरोधाः परमा गतिः।
न चातिक्रमितुं शक्यं वचनं सत्यवादिनः॥३॥
भावार्थ :-
‘समस्त इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियों के लिये पुरोहित वसिष्ठजी ही परमगति हैं। उन सत्यवादी महात्मा की बात को कोई अन्यथा नहीं कर सकता॥३॥
वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ५९
बालकाण्डम्
एकोनषष्टितमः सर्गः(सर्ग 59)
( विश्वामित्र का त्रिशंकु का यज्ञ कराने के लिये ऋषिमुनियों को आमन्त्रित करना और उनकी बात न मानने वाले महोदय तथा ऋषिपुत्रों को शाप देकर नष्ट करना )
श्लोक:
उक्तवाक्यं तु राजानं कृपया कुशिकात्मजः।
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं साक्षाच्चण्डालतां गतम्॥१॥
भावार्थ :-
[शतानन्दजी कहते हैं- श्रीराम!] साक्षात् चाण्डाल के स्वरूप को प्राप्त हुए राजा त्रिशंकु के पूर्वोक्त वचन को सुनकर कुशिकनन्दन विश्वामित्रजी ने दया से द्रवित होकर उनसे मधुर वाणीमें कहा-॥१॥
श्लोक:
इक्ष्वाको स्वागतं वत्स जानामि त्वां सुधार्मिकम्।
शरणं ते प्रदास्यामि मा भैषीनूपपुंगव॥२॥
भावार्थ :-
‘वत्स! इक्ष्वाकुकुलनन्दन! तुम्हारा स्वागत है, मैं जानता हूँ, तुम बड़े धर्मात्मा हो। नृपप्रवर! डरो मत, मैं तुम्हें शरण दूंगा॥२॥
श्लोक:
अहमामन्त्रये सर्वान् महर्षीन् पुण्यकर्मणः।
यज्ञसाह्यकरान् राजंस्ततो यक्ष्यसि निर्वृतः॥३॥
भावार्थ :-
‘राजन्! तुम्हारे यज्ञ में सहायता करने वाले समस्त पुण्यकर्मा महर्षियों को मैं आमन्त्रित करता हूँ फिर तुम आनन्दपूर्वक यज्ञ करना॥३॥
वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ६०
बालकाण्डम्
षष्टितमः सर्गः (सर्ग 60)
( ऋषियोंद्वारा यज्ञ का आरम्भ, त्रिशंकु का सशरीर स्वर्गगमन, इन्द्र द्वारा स्वर्ग से उनके गिराये जाने पर क्षुब्ध हुए विश्वामित्र का नूतन देवसर्ग के लिये उद्योग )
श्लोक:
तपोबलहतान् ज्ञात्वा वासिष्ठान् समहोदयान्।
ऋषिमध्ये महातेजा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत॥१॥
भावार्थ :-
[शतानन्दजी कहते हैं- श्रीराम!] महोदयसहित वसिष्ठ के पुत्रों को अपने तपोबल से नष्ट हुआ जानमहातेजस्वी विश्वामित्र ने ऋषियों के बीच में इस प्रकार कहा-॥१॥
श्लोक:
अयमिक्ष्वाकुदायादस्त्रिशङ्करिति विश्रुतः।
धर्मिष्ठश्च वदान्यश्च मां चैव शरणं गतः॥२॥
भावार्थ :-
‘मुनिवरो! ये इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न राजा त्रिशंकु हैं। ये विख्यात नरेश बड़े ही धर्मात्मा और दानी रहे हैं तथा इस समय मेरी शरण में आये हैं॥२॥
श्लोक:
स्वेनानेन शरीरेण देवलोकजिगीषया।
यथायं स्वशरीरेण देवलोकं गमिष्यति॥३॥
तथा प्रवर्त्यतां यज्ञो भवद्भिश्च मया सह।
भावार्थ :-
‘इनकी इच्छा है कि मैं अपने इसी शरीर से देवलोक पर अधिकार प्राप्त करूँ। अतः आपलोग मेरे साथ रहकर ऐसे यज्ञ का अनुष्ठान करें, जिससे इन्हें इस शरीर से ही देवलोक की प्राप्ति हो सके’॥३ १/२॥
मुख पृष्ठ┃अखंड रामायण┃AI बालकाण्डम् सर्गः- ६१-७०=》
- शीर्ष 10 दृश्य:
- श्री दुर्गा सप्तशती | Shri Durga Saptashati
- श्रीमद्भगवद् गीता I ShriBhagavadGeeta
- श्रीरामचरितमानस भावार्थ सहित- बालकाण्ड- 201-225
- बालकाण्ड | Balkanda
- सुन्दरकाण्ड | Sundarkanda
- श्री सत्यनारायण व्रत कथा संस्कृत में हिन्दी भावार्थ सहित
- लंकाकाण्ड | Lankakanda
- उत्तरकाण्ड | Uttarakhanda
- अरण्यकाण्ड | Aranyakanda
- किष्किन्धाकाण्ड | Kishkindhakanda











