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आओ चलें महाकुम्भ – एक ऐसी दुनिया जो मोक्ष का मार्ग है।

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दोस्तों महाकुम्भ- एक ऐसी दुनिया जो मोक्ष का मार्ग है और साथ ही आस्था, विश्वास, सौहार्द एवं संस्कृतियों के मिलन का पर्व है “महाकुम्भ”। ज्ञान, चेतना और उसका परस्पर मंथन कुम्भ मेले का वो आयाम है जो आदि काल से ही हिन्दू धर्मावलम्बियों की जागृत चेतना को बिना किसी आमन्त्रण के खींच कर ले आता है। कुम्भ पर्व किसी इतिहास निर्माण के दृष्टिकोण से नहीं शुरू हुआ था अपितु इसका इतिहास समय के प्रवाह से साथ स्वयं ही बनता चला गया। वैसे भी धार्मिक परम्पराएं हमेशा आस्था एवं विश्वास के आधार पर टिकती हैं न कि इतिहास पर। यह कहा जा सकता है कि कुम्भ जैसा विशालतम् मेला संस्कृतियों को एक सूत्र में बांधे रखने के लिए ही आयोजित होता है।

कुम्भ का शाब्दिक अर्थ कलश है। यहाँ ‘कलश’ का सम्बन्ध अमृत कलश से है। बात उस समय की है जब देवासुर संग्राम के बाद दोनों पक्ष समुद्र मंथन को राजी हुए थे। मथना था समुद्र तो मथनी और नेति भी उसी हिसाब की चाहिए थी। ऐसे में मंदराचल पर्वत मथनी बना और नागवासुकि उसकी नेति। मंथन से चौदह रत्नों की प्राप्ति हुई जिन्हें परस्पर बाँट लिया गया परन्तु जब धन्वन्तरि ने अमृत कलश देवताओं को दे दिया तो फिर युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई।

तब भगवान् विष्णु ने स्वयं मोहिनी रूप धारण कर सबको अमृत-पान कराने की बात कही और अमृत कलश का दायित्व इंद्र-पुत्र जयंत को सौपा। अमृत-कलश को प्राप्त कर जब जयंत दानवों से अमृत की रक्षा हेतु भाग रहे थे तभी इसी क्रम में अमृत की बूंदे पृथ्वी पर चार स्थानों पर गिरी- हरिद्वार, नासिक, उज्जैन और प्रयागराज। चूँकि विष्णु की आज्ञा से सूर्य, चन्द्र, शनि एवं बृहस्पति भी अमृत कलश की रक्षा कर रहे थे और विभिन्न राशियों (सिंह, कुम्भ एवं मेष) में विचरण के कारण ये सभी कुम्भ पर्व के द्योतक बन गये।

इस प्रकार ग्रहों एवं राशियों की सहभागिता के कारण कुम्भ पर्व ज्योतिष का पर्व भी बन गया। जयंत को अमृत कलश को स्वर्ग ले जाने में 12 दिन का समय लगा था और माना जाता है कि देवताओं का एक दिन पृथ्वी के एक वर्ष के बराबर होता है। यही कारण है कि कालान्तर में वर्णित स्थानों पर ही ग्रह-राशियों के विशेष संयोग पर 12 वर्षों में कुम्भ मेले का आयोजन होने लगा।

महाकुम्भ 2025 की प्रमुख तिथियां

  • पौष शुक्ल एकादशी 10 जनवरी 2025- महाकुंभ प्रथम स्नान तिथि  
  • पौष पूर्णिमा 13 जनवरी 2025- महाकुंभ द्वितीया स्नान तिथि 
  • माघ कृष्ण एकादशी 25 जनवरी, 2025- महाकुंभ चतुर्थ स्नान तिथि  
  • माघ कृष्ण त्रयोदशी 27 जनवरी, 2025- महाकुंभ पंचम स्नान तिथि 
  • माघ शुक्ल सप्तमी (रथ सप्तमी)-4 फरवरी, 2025 – महाकुंभ अष्टम स्नान तिथि  
  • माघ शुक्ल अष्टमी (भीष्माष्टमी) 5 फरवरी, 2025- महाकुंभ नवम स्नान तिथि
  • माघ शुक्ल एकादशी (जया एकादशी) -8 फरवरी, 2025- महाकुंभ दशम स्नान तिथि 
  • माघ शुक्ल त्रयोदशी (सोम प्रदोष व्रत) – 10 फरवरी, 2025 – महाकुंभ एकादश स्नान तिथि 
  • माघ पूर्णिमा, 12 फरवरी, 2025- महाकुंभ द्वादश स्नान तिथि 
  • फाल्गुन कृष्ण एकादशी, 24 फरवरी, 2025- महाकुंभ त्रयोदश स्नान तिथि 
  • महाशिवरात्रि, 26 फरवरी, 2025- महाकुंभ चतुर्दश स्नान पर्व 

शाही स्नान

  • माघ कृष्ण प्रतिपदा मकर संक्रांति 14 जनवरी 2025- महाकुंभ (प्रथम) शाही स्नान तिथि  
  • माघ (मौनी) अमावस्या -29 जनवरी, 2025- महाकुंभ षष्ठ स्नान (द्वितीय) प्रमुख शाही स्नान
  • माघ शुक्ल पंचमी (बसंत पंचमी)-2 फरवरी, 2025- महाकुंभ सप्तम स्नान, (तृतीय) (अंतिम) शाही स्नान 

महाकुम्भ में स्नान का महत्व ?

त्रिवेणी संगम यानी गंगा, यमुना व सरस्वती-तीनों पावन नदियों के संगम पर माघ मास और कुंभ पर्व पर स्नान, जप-पाठ और दानादि का धर्म शास्त्रों में विशेष महात्म्य वर्णित किया गया है। विधि पूर्वक माघ स्नान से बढ़कर कोई पवित्र और पाप नाशक पर्व नहीं। माघ मास में कुम्भ पर्व पर प्रयागराज में व्यक्ति तीन दिन भी नियमपूर्वक स्नान कर लेता है, तो उसे एक सहस्र अश्वमेघ यज्ञों को करने के बराबर पुण्य प्राप्त हो जाता है।

महाकुम्भ महापर्व भारत की प्राचीन गौरवमयी वैदिकता भारतवर्ष का सबसे बड़ा प्रतीक है। इस महापर्व के अवसर पर देश ही नहीं बल्कि विदेश तक से करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। ‘कुंभ शब्द हेतु इकट्ठे होक्या घड़ा और ‘कुम्भ’ का अर्थ विश्व ब्रह्माण्ड भी है। कर शब्द का अर्थ है घर या घड़ाषा, संस्कृति, महात्माओं एवं सामान्य श्रद्धालुजनों का समागम हो, वही कुम्भ महापर्व कहलाता है।

कुम्भ-पर्व के संबंध में वेद-पुराणों में अनेक महत्त्वपूर्ण मंत्र और प्रसंग मिलते हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि कुंभ-महापर्व अत्यन्त प्राचीन, प्रामाणिक और वैदिक धर्म से ओत-प्रोत है। ‘ऋग्वेद’ के दशम मण्डल के अनुसार कुंभ-पर्व में जाने वाला मनुष्य स्वयं स्नान, दान-होमादि सत्कर्मों के फलस्वरूप अपने पापों को वैसे ही नष्ट करता है, जैसे कुठार वन को काट देता है। जिस प्रकार नदी अपने तटों को काटती हुई प्रवाहित होती है, उसी प्रकार कुम्भ-पर्व मनुष्य के पूर्व कर्मों से प्राप्त हुए मानसिक व शारीरिक पापों को नष्ट करता है।

महाकुम्भ से जुड़ी रोचक बातें

महाकुम्भ

महाकुम्भ को धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से दुनिया का सबसे बड़ा मेला कहा जाता है। भारत में केवल 4 स्थानों प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में ये मेला लगता है। महाकुम्भ के दौरान नागा साधु सबसे पहले स्नान करते हैं। माना जाता है कि, महाकुम्भ में स्नान करने के बाद व्यक्ति के सभी पाप धुल जाते हैं और उसे ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है। महाकुम्भ मेले में जितने श्रद्धालु एक दिन में शामिल होते हैं, उतने किसी भी धार्मकि आयोजन में नहीं होते। महाकुम्भ के स्थान का चयन सूर्य, गुरु और चंद्रमा की स्थियों को देखकर किया जाता है। सैकड़ों वर्षों से महाकुम्भ का मेला निरंतर आयोजित किया जा रहा।

उल्लेखनीय है कि योगी सरकार हर बार की तरह 2025 में होने जा रहे महाकुम्भ को भी वृहद स्तर पर आयोजित करने के लिए प्रतिबद्ध है। महाकुम्भ-2025 में देश और दुनिया से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की बुनियादी जरूरतों के साथ ही सरकार उन्हें भव्य और दिव्य महाकुंभ का दर्शन भी कराएगी।

महाकुम्भ 2025 के लिए लखनऊ से प्रयागराज मार्ग को बटरफ्लाई लाइटिंग से सजाने और मुख्य चौराहों पर विशेष सजावट करने का निर्णय लिया गया है। 13 जनवरी से 26 फरवरी तक होने वाले इस आयोजन के लिए सड़क, पार्किंग, सुरक्षा और आवास के व्यापक इंतजाम किए जा रहे हैं। परिवहन निगम की बसों में भक्ति संगीत बजाने की भी योजना बनाई गई है। 13 जनवरी से 26 फरवरी तक होने वाले इस आयोजन के लिए मुख्य मार्गों और चौराहों पर विशेष सजावट की जाएगी। सड़क, पार्किंग, सुरक्षा और आवास के निर्माण के पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं।

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