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शनिदेव की कृपा पाने के लिए करें दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ

शनि स्तोत्र

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दोस्तों, हमारा यह जीवन उतनी सरल नहीं है जितना हम सोचते हैं। कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो हम चाहकर भी नहीं कर सकते, और कुछ ऐसी होती हैं जो हम चाहते भी नहीं और हो जाती है। वैसे अगर हम ज्योतिष शास्त्र की मानें तो यह हमारे पिछले जन्म के अच्छे-बुरे कर्मों का फल है। अगर हमने अच्छे कर्म किए हैं तो हमें अच्छे परिणाम भुगतने होंगे। अगर हमने बुरे कर्म किए हैं तो हमें बुरे परिणाम भुगतने होंगे।

और अगर ग्रहों की बात करें तो इनका भी हमारे जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ता है, यह सिद्ध है कि इनके प्रभाव से ही हमारे अच्छे और बुरे दिन आते रहते हैं। इसी क्रम में हमारा ग्रह शनि आता है, जिसे हम शनिदेव भी कहते हैं। आइए आज शनिदेव से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करते हैं। वैदिक ज्योतिष में शनिदेव का विशेष महत्व है। शनिदेव को कर्मफल दाता और सभी ग्रहों में न्यायकर्ता ग्रह माना जाता है। वहीं शनि का नाम आते ही लोग अक्सर इस बात से डर जाते हैं कि कहीं शनि की कुदृष्टि उन पर न पड़ जाए।

जब भी शनि की चाल में परिवर्तन होता है तो व्यक्ति पर शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या अवश्य शुरू हो जाती है। शनि सभी ग्रहों में सबसे धीमे ग्रह हैं, जिसके कारण इनका शुभ या अशुभ प्रभाव जातकों के जीवन पर लंबे समय तक बना रहता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अच्छे कर्म करने पर शनिदेव प्रसन्न होते हैं, वहीं बुरे कर्म करने पर शनिदेव जातकों को दंड भी देते हैं। शनिदेव की कृपा पाने के लिए शास्त्रों में बताए गए नियमों का पालन करते हुए विभिन्न उपाय किए जाते हैं। शास्त्रों में शनि दोष से मुक्ति और इसके प्रकोप से बचने के लिए शनि स्तोत्र का पाठ करना बहुत लाभकारी बताया गया है।

शनिदेव को प्रसन्न करने के उपाय

शनिदेव के दिव्य मंत्र ‘ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः’ का जाप करने से व्यक्ति भय मुक्त रहता है। शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए व्यक्ति को शनिवार के दिन व्रत रखना चाहिए और गरीब लोगों की मदद करनी चाहिए, ऐसा करने से जीवन में आने वाली परेशानियां दूर होने लगती हैं। हनुमानजी की पूजा करने वालों पर शनिदेव हमेशा प्रसन्न रहते हैं, इसलिए उनकी कृपा पाने के लिए शनि पूजा के साथ हनुमानजी की पूजा भी करनी चाहिए।

शनि स्तोत्र का पाठ करने की विधि

अगर शनिदेव किसी व्यक्ति पर प्रसन्न होते हैं तो वे उसे रंक से राजा बना देते हैं। ऐसे में शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए दशरथकृत शनिस्त्रोत का पाठ करना चाहिए। शनिवार के दिन शनि स्तोत्र का पाठ करना बहुत लाभकारी होता है। ऐसे में शनिवार की सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। फिर अपने घर के पास स्थित शनि मंदिर में जाएं और शनिदेव को सरसों के तेल का दीपक जलाकर अर्पित करें। फिर इसके बाद ध्यान करें और दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ करें।

दशरथकृत शनि स्तोत्र

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम:।।

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते।।

नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेఽथ वै नम:।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोఽस्तु ते।।

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम:।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोఽस्तु ते।
सूर्यपुत्र नमस्तेఽस्तु भास्करेఽभयदाय च।।

अधोदृष्टे: नमस्तेఽस्तु संवर्तक नमोఽस्तु ते।
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोఽस्तुते।।

तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम:।।

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेఽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्।।

देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा:।
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:।।

प्रसाद कुरु मे सौरे वारदो भव भास्करे।
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल:।।

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