शीतला माता व्रत कथा, पुजा विधि, शुभ मुहुर्त, उपाय और आरती
घातक बीमारियों से हैं परेशान तो ज़रूर करें शीतला माता व्रत का ये 2 काम, मिलेगा रोग मुक्ति का वरदान।
हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी और अष्टमी तिथि पर शीतला माता की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शीतला अष्टमी पर माता शीतला की उपासना करने से और व्रत का पालन करने से व्यक्ति को विशेष लाभ मिलता है और समस्त रोग एवं दोषों से मुक्ति मिल जाती है। शीतला अष्टमी का त्योहार उत्तर भारत के कुछ राज्यों जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान में काफी श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। माताएं इस दिन अपनी संतान की दीर्घायु के लिए व्रत करती हैं और शीतला माता की पूजा करके प्रार्थना करती हैं की माता उनके बच्चों को हर बीमारी से दूर रखें और उनकी रक्षा करें।
क्यों लगाते हैं माँ शीतला को बासी खाने का भोग?
ऐसा कहा जाता है कि शीतला सप्तमी सर्दियों के खत्म होने का प्रतीक है। यह सर्दी के मौसम का आखिरी दिन माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, इस शुभ अवसर पर मां शीतला को बासी खाने का भोग लगाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इससे मां खुश होती हैं और अपने भक्तों सुख-शांति, आरोग्य मुक्ति का वरदान देती हैं। ये भी कहा जाता है कि मां शीतला की पूजा से निरोगी काया का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है।
शीतला सप्तमी पूजा विधि
- सुबह जल्दी उठकर पवित्र स्नान करें।
- अपने घर और पूजा कक्ष की सफाई करें।
- गंगाजल से स्नान करवाएं
- कुमकुम का तिलक लगाएं।
- मां शीतला को सफेद फूलों की माला अर्पित करें।
- देवी शीतला को मालपुआ, हलवे आदि का भोग लगाएं।
- देसी घी का दीपक जलाएं।
- शीतला चालीसा का पाठ करें।
- आरती के साथ पूजा पूर्ण करें।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शीतला माता चेचक की देवी कहलाती हैं और मां की कृपा बच्चों पर बनी रहे इसलिए शीतला अष्टमी पर पूजा और उपाय किए जाते हैं। स्कंद पुराण में बताया गया है कि ब्रह्मा जी ने सृष्टि को रोगमुक्त और स्वच्छ रखने का कार्य शीतला माता को सौंप दिया था इसलिए इन्हें स्वच्छता की देवी के रूप में भी पूजा जाता है।
इसका आरंभ सप्तमी से ही हो जाता है। सप्तमी को ही घरों में भोजन बनाकर रख दिया जाता है। फिर शीतला अष्टमी पर मां शीतला को बासी खाने का भोग लगाकर स्वयं भी प्रसाद के रूप में इसे ग्रहण किया जाता है। शास्त्रों में इस दिन किए जाने वाले खास उपायों का खास वर्णन है तो आईए जानते हैं कौन से हैं वो उपाय-
शीतला सप्तमी की शाम को गुड़ के 21 गुलगुले बनाएं। इनके तीन हिस्से कर लें। पहले हिस्से को रख दें और इससे बासी भोजन के रूप में अष्टमी के दिन माता शीतला का भोग लगाएं। एक हिस्से को अष्टमी के दिन गाय को खिला दें। बाकी बचे एक हिस्से को रात में एक लोटा जल के साथ बच्चों के सिरहाने रख दें। सुबह उठकर उस लोटे के जल से बच्चों को छींटें दें और गुलगुले बच्चों के ऊपर से 7 बार उबारकर काले कुत्ते को खिला दें। ऐसा करने से आपके बच्चे संक्रामक बीमारियों से दूर रहते हैं और माता शीतला उनकी रक्षा करती हैं।
दूसरा उपाय है नकारात्मक विचारों से मुक्ति के लिए, अगर आपके दिमाग में अक्सर नकारात्मक विचार घूमते रहते हैं। आपको शीतला अष्टमी के दिन मातारानी की पूजा के बाद नीम के पेड़ की पूजा करनी चाहिए। नीम के पेड़ में जल देने के बाद सात बार परिक्रमा करें। इससे अंदर की नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है।
तीसरा उपाय हैं बीमारियों से बचाव के लिए, इसके लिए शीतला अष्टमी के दिन पूजा के दौरान मां शीतला को हल्दी भी अर्पित करें। पूजा के बाद ये हल्दी परिवार के सदस्यों को लगाएं। खासकर बच्चों को जरूर लगाएं। ऐसा करने से परिवार के सदस्यों और बच्चों की मौसमी रोगों के अलावा अन्य गंभीर बीमारियों से भी रक्षा होती है।
माता शीतला का वाहन गधा है। इस दिन गधे की सेवा जरूर करें। इसके अलावा माता का प्रसाद किसी कुम्हारनी को दें। ऐसा करने से आपकी पूजा सफल हो जाती है। इससे माता प्रसन्न होती हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है व परिवार के संकट दूर होते हैं।
देवी शीतला की कथा -1
किसी गांव में एक ब्राह्मण परिवार रहता थे। उस परिवार में माता-पिता के अलावा दो बेटे और 2 बहुएं भी थीं। शादी के बाद काफी समय बाद बहुओं को संतान हुई। संतान प्राप्ति के लिए जब पहली बार शीतला सप्तमी का व्रत आया तो पूजा के ठंडा भोजन बनाया गया।
तब दोनों बहुओं ने सोचा कि हम यदि ठंडा खाना खाएंगी तो हमारे बच्चे बीमार हो सकते हैं। ये सोचकर उन्हें बिना सास को बताए गर्म भोजन बना लिया और चुपके से खा भी लिया। जब उनकी सास घर आई तो कहा कि बच्चों को सोते-सोते काफी देर हो गई है, जाकर उन्हें उठा लो।
जैसे ही बहुएं बच्चों को उठाने गई तो देखा कि दोनों बच्चे मृत हैं। सास के द्वारा पूछने पर दोनों बहुओं ने उन्हें पूरी बात सच-सच बता दी। सास समझ गई कि ये सब शीतला माता के प्रकोप से हुआ है। सास ने दोनों बहुओं को घर से निकाल दिया और कहा कि ‘बच्चों को जिंदा लेकर ही घर लौटना।’
दोनों बहुएं बच्चों को टोकरी में रख घर से निकल पड़ी। रास्ते में एक पेड़ के नीचे दो बहनें बैठी थी जिनका नाम ओरी और शीतला था। दोनों के बालों में जूं थी, जिसे उन दोनों बहुओं ने निकाल दिया। प्रसन्न होकर उन्होंने कहा कि ‘तुम दोनों ने हमारे मस्तक को शीतल किया है वैसे ही तुम्हें पेट की शांति मिले।’
तब दोनों बहुओं ने कहा कि ‘हम दोनों देवी शीतला की खोज में भटक रही है, लेकिन हमें उनके दर्शन नहीं हुए।’ तभी वहां बैठी शीतला ने कहा कि ‘तुम दोनों ने शीतला सप्तमी पर गर्म खाना था, जिसकी वजह से तुम्हारे बच्चों की ये हालत हुई है।’ बहुएं समझ गईं कि ये कोई और नहीं देवी शीतला ही हैं।
दोनों बहुओं ने माता शीतला की पूजा और अपनी गलती पर माफी मांगी। प्रसन्न होकर शीतला माता ने उनके पुत्रों को जीवित कर दिया। दोनों बहुएं अपने पुत्रों को जीवित लेकर गांव में आईं पूरी बात अपनी सास और गांव वालों को बताई। तब गांव वालों ने मिलकर वहां शीतला माता का मंदिर बनवा दिया।
शीतला व्रत की कथा- 2
एक बार एक राजा के इकलौते पुत्र को चेचक (शीतला) निकल आईं। उसी के राज्य में एक गरीब के लड़के को भी चेचक निकली लेकिन मां भगवती के भक्त गरीब में बीमारी के नियमों का पालन करते हुए मां की पूजा और घर की नित्य सफाई की। नियमों का पालन करने से उसका पुत्र शीघ्र ही स्वस्थ हो गया. उधर राजा ने मां भगवती का शतचंडी पाठ कराने के साथ ही रोज भांति भांति के पकवान बनाए जाते और राजकुमार को भी वही भोग दिया जाता। इन सबके परिणाम स्वरूप उसका रोग बढ़ने लगा।
शरीर में बड़े बड़े फोड़े निकल आए जिनमें खुजली और जलन होने लगी। शीतला माता की शांति के लिए राजा जितने भी उपाय करता, शीतला का प्रकोप उतना ही बढ़ता जाता क्योंकि अज्ञानता के कारण वह सारे कर्म उलटे कर रहा था, शीतला माता की स्थिति में जिन कामों को नहीं करना चाहिए वह भी उसके द्वारा हो रहे थे।
उसे पता लगा कि उसके राज्य के एक गरीब व्यक्ति के बेटे को भी यही रोग हुआ जो ठीक भी हो गया। इसी चिंता में वह विचार करते हुए सो गया। तभी श्वेत वस्त्र पहने एक देवी ने स्वप्न में दर्शन दिए और उससे कहा कि मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूं किंतु तुमने नियमों का उल्लंघन किया है जिसके कारण तुम्हारा पुत्र स्वस्थ नहीं हो रहा है। इतना कह कर देवी अंतर्ध्यान हो गयीं। राजा की नींद खुली तो उसे बात समझ में आई और उसने माता शीतला की पूजा के साथ ही नियमों का पालन शुरू किया तो उसका राजकुमार स्वस्थ होने लगा।
हे माता शीतला जिस प्रकार आप सभी को स्वस्थ रखती है। हमारे ऊपर भी अपनी कृपा बनाए रखना माँ।
माता शीतला की आरती
जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता।
आदि ज्योति महारानी, सब फल की दाता॥
ॐ जय शीतला माता..॥
रतन सिंहासन शोभित, श्वेत छत्र भाता।
ऋद्धि-सिद्धि चँवर ढुलावें, जगमग छवि छाता॥
ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता।
विष्णु सेवत ठाढ़े, सेवें शिव धाता।
वेद पुराण वरणत, पार नहीं पाता॥
ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता।
इन्द्र मृदङ्ग बजावत, चन्द्र वीणा हाथा।
सूरज ताल बजावै, नारद मुनि गाता॥
ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता।
घण्टा शङ्ख शहनाई, बाजै मन भाता।
करै भक्तजन आरती, लखि लखि हर्षाता॥
ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता।
ब्रह्म रूप वरदानी, तुही तीन काल ज्ञाता।
भक्तन को सुख देती, मातु पिता भ्राता॥
ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता।
जो जन ध्यान लगावे, प्रेम शक्ति पाता।
सकल मनोरथ पावे, भवनिधि तर जाता॥
ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता।
रोगों से जो पीड़ित कोई, शरण तेरी आता।
कोढ़ी पावे निर्मल काया, अन्ध नेत्र पाता॥
ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता।
बांझ पुत्र को पावे, दारिद्र कट जाता।
ताको भजै जो नाहीं, सिर धुनि पछताता॥
ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता।
शीतल करती जननी, तू ही है जग त्राता।
उत्पत्ति व्याधि बिनाशन, तू सब की घाता॥
ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता।
दास विचित्र कर जोड़े, सुन मेरी माता।
भक्ति आपनी दीजै, और न कुछ भाता॥
जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता।
आदि ज्योति महारानी, सब फल की दाता॥
ॐ जय शीतला माता..॥
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