१८. स्वर्गारोहणपर्व- महाभारत

॥ 卐 ॥॥ श्री गणेशाय नमः ॥॥ श्री कमलापति नम: ॥॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥॥ श्री गुरूदेवाय नमः ॥ दान

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१७. महाप्रास्थानिकपर्व- महाभारत

॥ 卐 ॥॥ श्री गणेशाय नमः ॥॥ श्री कमलापति नम: ॥॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥॥ श्री गुरूदेवाय नमः ॥ दान

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१५. आश्रमवासिकपर्व- महाभारत

आश्रमवासिकपर्व में भाइयों समेत युधिष्ठिर और कुन्ती द्वारा धृतराष्ट्र तथा गान्धारी की सेवा, व्यास जी के समझाने पर धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती को वन में जाने देना, वहाँ जाकर इन तीनों का ॠषियों के आश्रम में निवास करना,

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१४. आश्वमेधिकपर्व- महाभारत

आश्वमेधिकपर्व में महर्षि व्यास द्वारा यज्ञ के लिए धन प्राप्त करने का उपाय युधिष्ठिर से बताना, अर्जुन द्वारा कृष्ण से गीता का विषय पूछना, श्री कृष्ण द्वारा अनेक आख्यानों द्वरा अर्जुन का समाधान करना, ब्राह्मणगीता का उपदेश, अन्य आध्यात्मिक बातें, अर्जुन द्वारा कृष्ण से गीता का विषय पूछना, ब्राह्मणगीता का उपदेश।

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१३. अनुशासनपर्व- महाभारत

भीष्म युधिष्ठिर को नाना प्रकार से तप, धर्म और दान की महिमा बतलाते हैं और अन्त में युधिष्ठिर पितामह की अनुमति पाकर हस्तिनापुर चले जाते हैं। इसमें भीष्म के पास युधिष्ठिर का जाना, युधिष्ठिर की भीष्म से बात, भीष्म का प्राणत्याग, युधिष्ठिर द्वारा उनका अन्तिम संस्कार।

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१२. शान्तिपर्व- महाभारत

शान्ति पर्व में युद्ध की समाप्ति पर युधिष्ठिर का शोकाकुल होकर पश्चाताप करना, श्री कृष्ण सहित सभी लोगों द्वारा उन्हें समझाना, युधिष्ठिर का नगर प्रवेश और राज्याभिषेक, सबके साथ पितामह भीष्म के पास जाना, भीष्म के द्वारा श्रीकृष्ण की स्तुति, भीष्म द्वारा युधिष्ठिर के प्रश्नों का उत्तर तथा उन्हें राजधर्म, आपद्धर्म और मोक्षधर्म का उपदेश करना आदि वर्णित है।

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११. स्त्रीपर्व- महाभारत

स्त्रीपर्व में दुर्योधन की मृत्यु पर धृतराष्ट्र का विलाप, स्त्रियों और प्रजा के साथ धृतराष्ट्र का युद्ध भूमि में जाना, श्री कृष्ण, पाण्डवों और अश्वत्थामा से उनकी भेंट, पाण्डवों का कुन्ती से मिलना, द्रौपदी, गान्धारी आदि स्त्रियों का विलाप, व्यास के वरदान से गान्धारी द्वारा दिव्यदृष्टि से युद्ध में निहत अपने पुत्रों और अन्य योद्धाओं को देखना तथा शोकातुर हो क्रोधवश शाप देना, युधिष्ठिर द्वारा मृत योद्धाओं का दाहसंस्कार और जलांजलिदान, कुन्ती द्वारा अपने गर्भ से कर्ण की उत्पत्ति का रहस्य बताना, युधिष्ठिर द्वारा कर्ण के लिए शोक प्रकट करते हुए उसका श्राद्ध कर्म करना और स्त्रियों के मन में रहस्य न छिपने का शाप देना आदि वर्णित है।

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१०. सौप्तिकपर्व- महाभारत

में अश्वत्थामा, कृतवर्मा और कृपाचार्य- कौरव पक्ष के शेष इन तीन महारथियों का वन में विश्राम करना, तीनों की आगे के कार्य के विषय में विस्तार पूर्वक मत्रणा करना, अश्वत्थामा द्वारा रात्रि मे चोरी से पाण्डवों के शिविर में घुसकर समस्त सोये हुए पांचाल वीरों का संहार करना, द्रौपदी के पुत्रों का वध करना, द्रौपदी का विलाप तथा द्रोणपुत्र के वध का आग्रह करना, भीम द्वारा अश्वत्थामा को मारने के लिए प्रस्थान करना और श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा युधिष्ठिर का भी भीम के पीछे जाना, गंगातट पर बैठे अश्वत्थामा को भीम द्वारा ललकारना, अश्वत्थामा द्वारा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना, अर्जुन द्वारा भी उस ब्रह्मास्त्र के निवारण के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना, व्यास की आज्ञा से अर्जुन द्बारा ब्रह्मास्त्र का उपशमन करना, अश्वत्थामा की मणि को निकाल लेना आदि विषय इस पर्व में वर्णित है।

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९. शल्यपर्व- महाभारत

में कर्ण की मृत्यु के पश्चात कृपाचार्य द्वारा सन्धि के लिए दुर्योधन को समझाना, सेनापति पद पर शल्य का अभिषेक करना, मद्रराज और शल्य का अदभुत पराक्रम, युधिष्ठिर द्वारा शल्य और उनके भाई का वध करना, सहदेव द्वारा शकुनि का वध करना, दुर्योधन का वहा से पलायन, युधिष्ठिर का दुर्योधन से संवाद करना, दुर्योधन के साथ भीम का वाग्युद्ध और गदा युद्ध करना और दुर्योधन का धराशायी होना, सेनापति पद पर अश्वत्थामा का अभिषेक आदि वर्णित है।

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८. कर्णपर्व- महाभारत

में द्रोणाचार्य की मृत्यु के पश्चात कौरव सेनापति के पद पर कर्ण का अभिषेक, कर्ण के सेनापतित्व में कौरव सेना द्वारा भीषण युद्ध, पाण्डवों के पराक्रम, शल्य द्वारा कर्ण का सारथि बनना, अर्जुन द्वारा कौरव सेना का भीषण संहार, कर्ण और अर्जुन का युद्ध, कर्ण के रथ के पहिये का पृथ्वी में धँसना, अर्जुन द्वारा कर्णवध, कौरवों का शोक, शल्य द्वारा दुर्योधन को सान्त्वना देना आदि वर्णित है। 

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७. द्रोणपर्व- महाभारत

में भीष्म के धराशायी होने पर कर्ण का आगमन और युद्ध करना, सेनापति पद पर द्रोणाचार्य का अभिषेक, द्रोणाचार्य द्वारा चक्रव्यूह का निर्माण, अभिमन्यु द्वारा पराक्रम और व्यूह में फँसे हुए अकेले नि:शस्त्र अभिमन्यु का कौरव महारथियों द्वारा वध, अभिमन्यु के वध से पाण्डव-पक्ष में शोक, कृष्ण द्वारा सहयोग का आश्वासन, अर्जुन का द्रोणाचार्य तथा कौरव-सेना से भयानक युद्ध, अर्जुन द्वारा जयद्रथ का वध, कर्ण द्वारा घटोत्कच का वध, धृष्टद्युम्न द्वारा द्रोणाचार्य का वध।

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