वाल्मीकी रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ५०

बालकाण्ड सर्ग- ५०

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बालकाण्ड सर्ग- ५०

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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बालकाण्ड सर्ग- ५०

AI वाल्मीकि रामायण
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बालकाण्ड सर्ग- ५०

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बालकाण्डम्
पञ्चाशः सर्गः (सर्ग 50)

( श्रीराम आदि का मिथिला-गमन, राजा जनक द्वारा विश्वामित्र का सत्कार तथा उनका श्रीराम और लक्ष्मण के विषय में जिज्ञासा करना एवं परिचय पाना )

श्लोक:
ततः प्रागुत्तरां गत्वा रामः सौमित्रिणा सह।
विश्वामित्रं पुरस्कृत्य यज्ञवाटमुपागमत्॥१॥

भावार्थ :-
तदनन्तर लक्ष्मण सहित श्रीराम विश्वामित्रजी को – आगे करके महर्षि गौतम के आश्रम से ईशान कोण की ओर चले और मिथिला नरेश के यज्ञमण्डप में जा पहुँचे॥१॥

श्लोक:
रामस्तु मुनिशार्दूलमुवाच सहलक्ष्मणः।
साध्वी यज्ञसमृद्धिर्हि जनकस्य महात्मनः॥२॥

भावार्थ :-
वहाँ लक्ष्मण सहित श्रीरामने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र से कहा- ’महाभाग! महात्मा जनक के यज्ञका समारोह तो बड़ा सुन्दर दिखायी दे रहा है॥२॥

श्लोक:
बहूनीह सहस्राणि नानादेशनिवासिनाम्।
ब्राह्मणानां महाभाग वेदाध्ययनशालिनाम्॥३॥

भावार्थ :-
यहाँ नाना देशोंके निवासी सहस्रों ब्राह्मण जुटे हुए हैं, जो वेदोंके स्वाध्यायसे शोभा पा रहे हैं॥३॥

श्लोक:
ऋषिवाटाश्च दृश्यन्ते शकटीशतसंकुलाः।
देशो विधीयतां ब्रह्मन् यत्र वत्स्यामहे वयम्॥४॥

भावार्थ :-
‘ऋषियों के बाड़े सैकड़ों छकड़ों से भरे दिखायी दे रहे हैं। ब्रह्मन्! अब ऐसा कोई स्थान निश्चित कीजिये, जहाँ हम लोग भी ठहरें’॥४॥

श्लोक:
रामस्य वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रो महामुनिः।
>निवासमकरोद देशे विविक्ते सलिलान्विते॥५॥

भावार्थ :-
श्रीरामचन्द्रजी का यह वचन सुनकर महामुनि विश्वामित्र ने एकान्त स्थान में डेरा डाला, जहाँ पानी का सुभीता था॥५॥

श्लोक:
विश्वामित्रमनुप्राप्तं श्रुत्वा नृपवरस्तदा।
शतानन्दं पुरस्कृत्य पुरोहितमनिन्दितः॥६॥

भावार्थ :-
अनिन्द्य (उत्तम) आचार-विचार वाले नृपश्रेष्ठ महाराज जनक ने जब सुना कि विश्वामित्रजी पधारे हैं, तब वे तुरंत अपने पुरोहित शतानन्द को आगे करके [अर्घ्य लिये विनीत भाव से उनका स्वागत करने को चल दिये]॥६॥

श्लोक:
ऋत्विजोऽपि महात्मानस्त्वय॑मादाय सत्वरम्।
प्रत्युज्जगाम सहसा विनयेन समन्वितः॥७॥
विश्वामित्राय धर्मेण ददौ धर्मपुरस्कृतम्।

भावार्थ :-
उनके साथ अर्घ्य लिये महात्मा ऋत्विज भी शीघ्रतापूर्वक चले। राजा ने विनीत भाव से सहसा आगे बढ़कर महर्षिकी अगवानी की तथा धर्मशास्त्र के अनुसार विश्वामित्र को धर्मयुक्त अर्घ्य समर्पित किया॥७ १/२॥

श्लोक:
प्रतिगृह्य तु तां पूजां जनकस्य महात्मनः॥८॥
पप्रच्छ कुशलं राज्ञो यज्ञस्य च निरामयम्।

भावार्थ :-
महात्मा राजा जनक की वह पूजा ग्रहण करके मुनि ने उनका कुशल-समाचार पूछा तथा उनके यज्ञ की निर्बाध स्थिति के विषय में जिज्ञासा की॥८ १/२॥

श्लोक:
स तांश्चाथ मुनीन् पृष्ट्वा सोपाध्यायपुरोधसः॥९॥
यथार्हमृषिभिः सर्वैः समागच्छत् प्रहृष्टवत्।

भावार्थ :-
राजा के साथ जो मुनि, उपाध्याय और पुरोहित आये थे, उनसे भी कुशल-मंगल पूछकर विश्वामित्र जी बड़े हर्ष के साथ उन सभी महर्षियों से यथा योग्य मिले॥९ १/२॥

श्लोक:
अथ राजा मुनिश्रेष्ठं कृताञ्जलिरभाषत॥१०॥
आसने भगवानास्तां सहैभिर्मुनिपुंगवैः।

भावार्थ :-
इसके बाद राजा जनक ने मुनिवर विश्वामित्र से हाथ जोड़कर कहा- ’भगवन्! आप इन मुनीश्वरों के साथ आसन पर विराजमान होइये’॥१० १/२॥

श्लोक:
जनकस्य वचः श्रुत्वा निषसाद महामुनिः॥११॥
पुरोधा ऋत्विजश्चैव राजा च सहमन्त्रिभिः।
आसनेषु यथान्यायमुपविष्टाः समन्ततः॥१२॥

भावार्थ :-
यह बात सुनकर महामुनि विश्वामित्र आसन पर बैठ गये। फिर पुरोहित, ऋत्विज् तथा मन्त्रियों सहित राजा भी सब ओर यथायोग्य आसनों पर विराजमान हो गये॥११-१२॥

श्लोक:
दृष्ट्वा स नृपतिस्तत्र विश्वामित्रमथाब्रवीत्।
अद्य यज्ञसमृद्धिर्मे सफला दैवतैः कृता॥१३॥

भावार्थ :-
तत्पश्चात् राजा जनक ने विश्वामित्रजी की ओर देखकर कहा- ’भगवन्! आज देवताओं ने मेरे यज्ञ की आयोजना सफल कर दी॥१३॥

श्लोक:
अद्य यज्ञफलं प्राप्तं भगवदर्शनान्मया।
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे मुनिपुंगवः॥१४॥
यज्ञोपसदनं ब्रह्मन् प्राप्तोऽसि मुनिभिः सह।

भावार्थ :-
‘आज पूज्य चरणों के दर्शन से मैंने यज्ञ का फल पा लिया। ब्रह्मन्! आप मुनियों में श्रेष्ठ हैं आपने इतने महर्षियों के साथ मेरे यज्ञमण्डप में पदार्पण किया, – इससे मैं धन्य हो गया। यह मेरे ऊपर आपका बहुत बड़ा अनुग्रह है॥१४ १/२॥

श्लोक:
द्वादशाहं तु ब्रह्मर्षे दीक्षामाहुर्मनीषिणः॥१५॥
ततो भागार्थिनो देवान् द्रष्टमर्हसि कौशिक।

भावार्थ :-
‘ब्रह्मर्षे! मनीषी ऋत्विजों का कहना है कि ‘मेरी यज्ञ दीक्षा के बारह दिन ही शेष रह गये हैं,अतः कुशिकनन्दन! बारह दिनों के बाद यहाँ भाग ग्रहण करने के लिये आये हुए देवताओं का दर्शन कीजियेगा’॥१५ १/२॥

श्लोक:
इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलं प्रहृष्टवदनस्तदा॥१६॥
पुनस्तं परिपप्रच्छ प्राञ्जलिः प्रयतो नृपः।

भावार्थ :-
>मुनिवर विश्वामित्र से ऐसा कहकर उस समय प्रसन्नमुख हुए जितेन्द्रिय राजा जनक ने पुनः उनसे हाथ जोड़कर पूछा-॥१६ १/२॥

श्लोक:
इमौ कुमारौ भद्रं ते देवतुल्यपराक्रमौ॥१७॥
गजतुल्यगती वीरौ शार्दूलवृषभोपमौ।
पद्मपत्रविशालाक्षौ खड्गतूणीधनुर्धरौ।
अश्विनाविव रूपेण समुपस्थितयौवनौ॥१८॥

भावार्थ :-
‘महामुने! आपका कल्याण हो देवताके समान पराक्रमी और सुन्दर आयुध धारण करने वाले ये दोनों वीर राजकुमार जो हाथी के समान मन्दगति से चलते हैं, सिंह और साँड़ के समान जान पड़ते हैं, प्रफुल्ल कमल दल के समान सुशोभित हैं, तलवार, तरकस और धनुष धारण किये हुए हैं, अपने मनोहर रूप से अश्विनीकुमारों को भी लज्जित कर रहे हैं, जिन्होंने अभी-अभी यौवनावस्था में प्रवेश किया है तथा-॥१७-१८॥

श्लोक:
यदृच्छयेव गां प्राप्तौ देवलोकादिवामरौ।
कथं पद्भ्यामिह प्राप्तौ किमर्थं कस्य वा मुने॥१९॥
वरायुधधरौ वीरौ कस्य पुत्रौ महामुने।
भूषयन्ताविमं देशं चन्द्रसूर्याविवाम्बरम्॥२०॥
परस्परस्य सदृशौ प्रमाणेङ्गितचेष्टितैः।
काकपक्षधरौ वीरौ श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः॥२१॥

भावार्थ :-
जो स्वेच्छानुसार देवलोक से उतरकर पृथ्वी पर आये हुए दो देवताओं के समान जान पड़ते हैं, किसके पुत्र हैं? और यहाँ कैसे, किसलिये अथवा किस उद्देश्य से पैदल ही पधारे हैं? जैसे चन्द्रमा और सूर्य आकाश की शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार ये अपनी उपस्थिति से इस देश को विभूषित कर रहे हैं। ये दोनों एक-दूसरे से बहुत मिलते-जुलते हैं। इनके शरीर की ऊँचाई, संकेत और चेष्टाएँ प्रायः एक-सी हैं। मैं इन दोनों काकपक्षधारी वीरों का परिचय एवं वृत्तान्त यथार्थरूप से सुनना चाहता हूँ’॥१७–२१॥

श्लोक:
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा जनकस्य महात्मनः।
न्यवेदयदमेयात्मा पुत्रौ दशरथस्य तौ॥२२॥

भावार्थ :-
महात्मा जनक का यह प्रश्न सुनकर अमित आत्मबल से सम्पन्न विश्वामित्रजी ने कहा—’राजन्! ये दोनों महाराज दशरथ के पुत्र हैं’॥२२॥

श्लोक:
सिद्धाश्रमनिवासं च राक्षसानां वधं तथा।
तत्रागमनमव्यग्रं विशालायाश्च दर्शनम्॥२३॥
अहल्यादर्शनं चैव गौतमेन समागमम्।
महाधनुषि जिज्ञासां कर्तुमागमनं तथा॥२४॥

भावार्थ :-
इसके बाद उन्होंने उन दोनों के सिद्धाश्रम में निवास, राक्षसों के वध, बिना किसी घबराहट के मिथिला तक आगमन, विशालापुरी के दर्शन, अहल्या के साक्षात्कार तथा महर्षि गौतम के साथ समागम आदि का विस्तारपूर्वक वर्णन किया। फिर अन्त में यह भी बताया कि ‘ये आपके यहाँ रखे हुए महान् धनुष के सम्बन्ध में कुछ जानने की इच्छा से यहाँ तक आये हैं’॥२३-२४॥

श्लोक:
एतत् सर्वं महातेजा जनकाय महात्मने।
निवेद्य विररामाथ विश्वामित्रो महामुनिः॥२५॥

भावार्थ :-
महात्मा राजा जनक से ये सब बातें निवेदन करके महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र चुप हो गये॥२५॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चाशः सर्गः॥५०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५०॥

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