वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- १

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॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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बालकाण्ड सर्ग-१

AI वाल्मीकि रामायण
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AI बालकाण्ड सर्ग- १



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बालकाण्डम्
प्रथमः सर्गः (सर्ग 1)

( नारदजी का वाल्मीकि मुनि को संक्षेप से श्रीरामचरित्र सुनाना )

श्लोक:
ॐ तपःस्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम्।
नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुंगवम्॥१॥

भावार्थ :-
तपस्वी वाल्मीकि जी ने तपस्या और स्वाध्याय में लगे हुए विद्वानों में श्रेष्ठ मुनिवर नारदजी से पूछा-॥१॥

श्लोक:
को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान्।
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः॥२॥

भावार्थ :-
‘[मुने!] इस समय इस संसार में गुणवान्, वीर्यवान्, धर्मज्ञ, उपकार मानने वाला, सत्यवक्ता और दृढ़प्रतिज्ञ कौन है?॥२॥

श्लोक:
चारित्रेण च को युक्तः सर्वभूतेषु को हितः।
विद्वान् कः कः समर्थश्च कश्चैकप्रियदर्शनः॥३॥

भावार्थ :-
‘सदाचार से युक्त, समस्त प्राणियों का हितसाधक, विद्वान्, सामर्थ्यशाली और एकमात्र प्रियदर्शन (सुन्दर) पुरुष कौन है?॥३॥

श्लोक:
आत्मवान् को जितक्रोधो द्युतिमान् कोऽनसूयकः।
कस्य बिभ्यति देवाश्च जातरोषस्य संयुगे॥४॥

भावार्थ :-
‘मनपर अधिकार रखने वाला, क्रोध को जीतने वाला, कान्तिमान् और किसी की भी निन्दा नहीं करने वाला कौन है? तथा संग्राम में कुपित होने पर किससे देवता भी डरते हैं?॥४॥

श्लोक:
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे।
महर्षे त्वं समर्थोऽसि ज्ञातुमेवंविधं नरम्॥५॥

भावार्थ :-
‘महर्षे! मैं यह सुनना चाहता हूँ, इसके लिये मुझे बड़ी उत्सुकता है और आप ऐसे पुरुष को जानने में समर्थ हैं’॥५॥

श्लोक:
श्रुत्वा चैतत्रिलोकज्ञो वाल्मीकेर्नारदो वचः।
श्रूयतामिति चामन्त्र्य प्रहृष्टो वाक्यमब्रवीत्॥६॥

भावार्थ :-
महर्षि वाल्मीकि के इस वचन को सुनकर तीनों लोकों का ज्ञान रखने वाले नारदजी ने उन्हें सम्बोधित करके कहा, अच्छा सुनिये और फिर प्रसन्नतापूर्वक बोले-॥६॥

श्लोक:
बहवो दुर्लभाश्चैव ये त्वया कीर्तिता गुणाः।
मुने वक्ष्याम्यहं बुद्ध्वा तैर्युक्तः श्रूयतां नरः॥७॥

भावार्थ :-
‘मुने! आपने जिन बहुत-से दुर्लभ गुणों का वर्णन किया है, उनसे युक्त पुरुष को मैं विचार करके कहता हूँ, आप सुनें॥७॥

श्लोक:
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः।
नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान् वशी॥८॥

भावार्थ :-
‘इक्ष्वाकु के वंश में उत्पन्न हुए एक ऐसे पुरुष हैं, जो लोगों में राम-नाम से विख्यात हैं, वे ही मन को वश में रखने वाले, महाबलवान्, कान्तिमान्, धैर्यवान् और जितेन्द्रिय हैं॥८॥

श्लोक:
बुद्धिमान् नीतिमान् वाग्मी श्रीमान् शत्रुनिबर्हणः।
विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवो महाहनुः॥९॥

भावार्थ :-
‘वे बुद्धिमान्, नीतिज्ञ, वक्ता, शोभायमान तथा शत्रुसंहारक हैं। उनके कंधे मोटे और भुजाएँ बड़ी-बड़ी हैं। ग्रीवा शङ्ख के समान और ठोढ़ी मांसल (पुष्ट) है॥९॥

श्लोक:
महोरस्को महेष्वासो गूढजत्रुररिन्दमः।
आजानुबाहुः सुशिराः सुललाटः सुविक्रमः॥१०॥

भावार्थ :-
‘उनकी छाती चौड़ी तथा धनुष बड़ा है, गले के नीचे की हड्डी (हँसली) मांससे छिपी हुई है। वे शत्रुओं का दमन करने वाले हैं। भुजाएँ घुटने तक लम्बी हैं, मस्तक सुन्दर है, ललाट भव्य और चाल मनोहर है॥१०॥

श्लोक:
समः समविभक्तांगः स्निग्धवर्णः प्रतापवान्।
पीनवक्षा विशालाक्षो लक्ष्मीवान् शुभलक्षणः॥११॥

भावार्थ :-
‘उनका शरीर अधिक ऊँचा या नाटा न होकर मध्यम और सुडौल है, देहका रंग चिकना है। वे बड़े प्रतापी हैं। उनका वक्षः स्थल भरा हुआ है, आँखें बड़ी-बड़ी हैं। वे शोभायमान और शुभलक्षणों से सम्पन्न हैं॥११॥

श्लोक:
धर्मज्ञः सत्यसंधश्च प्रजानां च हिते रतः।
यशस्वी ज्ञानसम्पन्नः शुचिर्वश्यः समाधिमान्॥१२॥

भावार्थ :-
‘धर्मके ज्ञाता, सत्यप्रतिज्ञ तथा प्रजा के हित-साधन में लगे रहने वाले हैं। वे यशस्वी, ज्ञानी, पवित्र, जितेन्द्रिय और मनको एकाग्र रखने वाले हैं॥१२॥

श्लोक:
प्रजापतिसमः श्रीमान् धाता रिपुनिषूदनः।
रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता॥१३॥

भावार्थ :-
‘प्रजापति के समान पालक, श्रीसम्पन्न, वैरिविध्वंसक और जीवों तथा धर्म के रक्षक हैं॥१३॥

श्लोक:
रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता।
वेदवेदांगतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः॥१४॥

भावार्थ :-
‘स्वधर्म और स्वजनों के पालक, वेद-वेदांगों के तत्त्ववेत्ता तथा धनुर्वेद में प्रवीण हैं॥१४॥

श्लोक:
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः स्मृतिमान् प्रतिभानवान्।
सर्वलोकप्रियः साधुरदीनात्मा विचक्षणः॥१५॥

भावार्थ :-
‘वे अखिल शास्त्रों के तत्त्वज्ञ, स्मरण शक्ति से युक्त और प्रतिभा सम्पन्न हैं। अच्छे विचार और उदार हृदय वाले वे श्रीरामचन्द्र जी बात-चीत करने में चतुर तथा समस्त लोकों के प्रिय हैं॥१५॥

श्लोक:
सर्वदाभिगतः सद्भिः समुद्र इव सिन्धुभिः।
आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः॥१६॥

भावार्थ :-
‘जैसे नदियाँ समुद्र में मिलती हैं, उसी प्रकार सदा राम से साधु पुरुष मिलते रहते हैं। वे आर्य एवं सबमें समान भाव रखने वाले हैं, उनका दर्शन सदा ही प्रिय मालूम होता है॥१६॥

श्लोक:
स च सर्वगुणोपेतः कौसल्यानन्दवर्धनः।
समुद्र इव गाम्भीर्ये धैर्येण हिमवानिव॥१७॥

भावार्थ :-
‘सम्पूर्ण गुणों से युक्त वे श्रीरामचन्द्र जी अपनी माता कौसल्या के आनन्द बढ़ाने वाले हैं, गम्भीरता में समुद्र और धैर्यमें हिमालय के समान हैं॥१७॥

श्लोक:
विष्णुना सदृशो वीर्ये सोमवत्प्रियदर्शनः।
कालाग्निसदृशः क्रोधे क्षमया पृथिवीसमः॥१८॥
धनदेन समस्त्यागे सत्ये धर्म इवापरः।

भावार्थ :-
‘वे विष्णु भगवान् के समान बलवान् हैं। उनका दर्शन चन्द्रमा के समान मनोहर प्रतीत होता है। वे क्रोध में कालाग्नि के समान और क्षमा में पृथिवी के सदृश हैं, त्याग में कुबेर और सत्यमें द्वितीय धर्मराज के समान हैं॥१८ १/२॥

श्लोक:
तमेवंगुणसम्पन्नं रामं सत्यपराक्रमम्॥१९॥
ज्येष्ठं ज्येष्ठगुणैर्युक्तं प्रियं दशरथः सुतम्।
प्रकृतीनां हितैर्युक्तं प्रकृतिप्रियकाम्यया॥२०॥
यौवराज्येन संयोक्तुमैच्छत् प्रीत्या महीपतिः।

भावार्थ :-
‘इस प्रकार उत्तम गुणों से युक्त और सत्यपराक्रम वाले सद्गुणशाली अपने प्रियतम ज्येष्ठ पुत्र को, जो प्रजा के हित में संलग्न रहने वाले थे, प्रजावर्ग का हित करने की इच्छा से राजा दशरथ ने प्रेमवश युवराज पद पर अभिषिक्त करना चाहा॥१९-२० १/२॥

श्लोक:
तस्याभिषेकसम्भारान् दृष्ट्वा भार्याथ कैकयी॥२१॥
पूर्वं दत्तवरा देवी वरमेनमयाचत।
विवासनं च रामस्य भरतस्याभिषेचनम्॥२२॥

भावार्थ :-
‘तदनन्तर राम के राज्याभिषेक की तैयारियाँ देखकर रानी कैकेयी ने, जिसे पहले ही वर दिया जा चुका था, राजा से यह वर माँगा कि रामका निर्वासन (वनवास) और भरतका राज्याभिषेक हो॥२१-२२॥

श्लोक:
स सत्यवचनाद् राजा धर्मपाशेन संयतः।
विवासयामास सुतं रामं दशरथः प्रियम्॥२३॥

भावार्थ :-
‘राजा दशरथ ने सत्य वचन के कारण धर्म-बन्धन में बँधकर प्यारे पुत्र राम को वनवास दे दिया॥२३॥

श्लोक:
स जगाम वनं वीरः प्रतिज्ञामनुपालयन्।
पितुर्वचननिर्देशात् कैकेय्याः प्रियकारणात्॥२४॥

भावार्थ :-
‘कैकेयी का प्रिय करने के लिये पिता की आज्ञा के अनुसार उनकी प्रतिज्ञा का पालन करते हुए वीर रामचन्द्र वन को चले॥२४॥

श्लोक:
तं व्रजन्तं प्रियो भ्राता लक्ष्मणोऽनुजगाम ह।
स्नेहाद् विनयसम्पन्नः सुमित्रानन्दवर्धनः॥२५॥
भ्रातरं दयितो भ्रातुः सौभ्रात्रमनुदर्शयन्।

भावार्थ :-
‘तब सुमित्रा के आनन्द बढ़ाने वाले विनयशील लक्ष्मण जी ने भी, जो अपने बड़े भाई राम को बहुत ही प्रिय थे, अपने सुबन्धुत्वका परिचय देते हुए स्नेहवश वन को जाने वाले बन्धुवर राम का अनुसरण किया॥२५ १/२॥

श्लोक:
रामस्य दयिता भार्या नित्यं प्राणसमा हिता॥२६॥
जनकस्य कुले जाता देवमायेव निर्मिता।
सर्वलक्षणसम्पन्ना नारीणामुत्तमा वधूः॥२७॥
सीताप्यनुगता रामं शशिनं रोहिणी यथा।
पौरैरनुगतो दूरं पित्रा दशरथेन च॥२८॥

भावार्थ :-
‘और जनक के कुल में उत्पन्न सीता भी, जो अवतीर्ण हुई देवमाया की भाँति सुन्दरी, समस्त शुभलक्षणों से विभूषित, स्त्रियों में उत्तम, राम के प्राणों के समान प्रियतमा पत्नी तथा सदा ही पति का हित चाहने वाली थी, रामचन्द्रजी के पीछे चली; जैसे। चन्द्रमा के पीछे रोहिणी चलती है। उस समय पिता दशरथ [ने अपना सारथि भेजकर] और पुरवासी मनुष्यों ने [स्वयं साथ जाकर] दूर तक उनका अनुसरण किया॥२६–२८॥

श्लोक:
श्रृंगवेरपुरे सूतं गंगाकुले व्यसर्जयत्।
गुहमासाद्य धर्मात्मा निषादाधिपतिं प्रियम्॥२९॥

भावार्थ :-
‘फिर शृंगवेरपुर में गंगा-तट पर अपने प्रिय निषादराज गुह के पास पहुँचकर धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी ने सारथि को [अयोध्या के लिये] विदा कर दिया॥२९॥

श्लोक:
गुहेन सहितो रामो लक्ष्मणेन च सीतया।
ते वनेन वनं गत्वा नदीस्तीक़ बहूदकाः॥३०॥
चित्रकूटमनुप्राप्य भरद्वाजस्य शासनात्।
रम्यमावसथं कृत्वा रममाणा वने त्रयः॥३१॥
देवगन्धर्वसंकाशास्तत्र ते न्यवसन् सुखम्।

भावार्थ :-
‘निषादराज गुह, लक्ष्मण और सीता के साथ राम। ये चारों एक वन से दूसरे वन में गये। मार्ग में बहुत जलों वाली अनेकों नदियों को पार करके [भरद्वाज के आश्रम पर पहुँचे और गुह को वहीं छोड़] भरद्वाज मुनि की आज्ञा से चित्रकूट पर्वत पर गये। वहाँ वे तीनों देवता और गन्धर्वो के समान वन में नाना प्रकार की लीलाएँ करते हुए एक रमणीय पर्णकुटी बनाकर उसमें सानन्द रहने लगे॥३०-३१ १/२॥

श्लोक:
चित्रकूटं गते रामे पुत्रशोकातुरस्तदा॥३२॥
राजा दशरथः स्वर्गं जगाम विलपन् सुतम्।

भावार्थ :-
‘राम के चित्रकूट चले जाने पर पुत्रशोक से पीडित राजा दशरथ उस समय पुत्र के लिये [उसका नाम ले लेकर] विलाप करते हुए स्वर्गगामी हुए॥३२ १/२॥

श्लोक:
गते तु तस्मिन् भरतो वसिष्ठप्रमुखैर्द्विजैः॥३३॥
नियुज्यमानो राज्याय नैच्छद् राज्यं महाबलः।
स जगाम वनं वीरो रामपादप्रसादकः॥३४॥

भावार्थ :-
‘उनके स्वर्गगमन के पश्चात् वसिष्ठ आदि प्रमुख ब्राह्मणों द्वारा राज्यसंचालन के लिये नियुक्त किये जाने पर भी महाबलशाली वीर भरत ने राज्य की कामना न करके पूज्य राम को प्रसन्न करने के लिये वन को ही प्रस्थान किया॥३३-३४॥

श्लोक:
गत्वा तु स महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम्।
अयाचद् भ्रातरं राममार्यभावपुरस्कृतः॥३५॥
त्वमेव राजा धर्मज्ञ इति रामं वचोऽब्रवीत्।

भावार्थ :-
‘वहाँ पहुँच कर सद्भावनायुक्त भरतजी ने अपने बड़े भाई सत्यपराक्रमी महात्मा राम से याचना की और यों कहा-धर्मज्ञ! आप ही राजा हों’॥३५ १/२॥

श्लोक:
रामोऽपि परमोदारः सुमुखः सुमहायशाः॥३६॥
न चैच्छत् पितुरादेशाद् राज्यं रामो महाबलः।
पादुके चास्य राज्याय न्यासं दत्त्वा पुनः पुनः॥३७॥
निवर्तयामास ततो भरतं भरताग्रजः।

भावार्थ :-
‘परंतु महान् यशस्वी परम उदार प्रसन्न मुख महाबली राम ने भी पिता के आदेश का पालन करते हुए राज्य की अभिलाषा न की और उन भरताग्रज ने राज्य के लिये न्यास (चिह्न) रूप में अपनी खड़ाऊँ भरत को देकर उन्हें बार-बार आग्रह करके लौटा दिया॥३६-३७ १/२॥

श्लोक:
स काममनवाप्यैव रामपादावुपस्पृशन्॥३८॥
नन्दिग्रामेऽकरोद् राज्यं रामागमनकांक्षया।

भावार्थ :-
‘अपनी अपूर्ण इच्छा को लेकर ही भरत ने राम के चरणों का स्पर्श किया और राम के आगमन की प्रतीक्षा करते हुए वे नन्दिग्राम में राज्य करने लगे॥३८ १/२॥

श्लोक:
गते तु भरते श्रीमान् सत्यसंधो जितेन्द्रियः॥३९॥
रामस्तु पुनरालक्ष्य नागरस्य जनस्य च।
तत्रागमनमेकाग्रो दण्डकान् प्रविवेश ह॥४०॥

भावार्थ :-
‘भरत के लौट जाने पर सत्य प्रतिज्ञ जितेन्द्रिय श्रीमान्। राम ने वहाँ पर पुनः नागरिक जनों का आना-जाना देखकर उनसे बचने के लिये) एकाग्र भावसे दण्डकारण्य में प्रवेश किया॥३९-४०॥

श्लोक:
प्रविश्य तु महारण्यं रामो राजीवलोचनः।
विराधं राक्षसं हत्वा शरभंगं ददर्श ह॥४१॥
सुतीक्ष्णं चाप्यगस्त्यं च अगस्त्यभ्रातरं तथा।

भावार्थ :-
‘उस महान् वन में पहुँचने पर कमल लोचन राम ने विराध नामक राक्षस को मारकर शरभंग, सुतीक्ष्ण, अगस्त्य मुनि तथा अगस्त्य के भ्राता का दर्शन किया॥४१ १/२॥

श्लोक:
अगस्त्यवचनाच्चैव जग्राहैन्द्रं शरासनम्॥४२॥
खड्गं च परमप्रीतस्तूणी चाक्षयसायकौ।

भावार्थ :-
‘फिर अगस्त्य मुनि के कहने से उन्होंने ऐन्द्र धनुष, एक खड्ग और दो तूणीर, जिनमें बाण कभी नहीं घटते थे, प्रसन्नता पूर्वक ग्रहण किये॥४२ १/२॥

श्लोक:
वसतस्तस्य रामस्य वने वनचरैः सह॥४३॥
ऋषयोऽभ्यागमन् सर्वे वधायासुररक्षसाम्।

भावार्थ :-
‘एक दिन वन में वनचरों के साथ रहने वाले श्रीराम के पास असुर तथा राक्षसों के वध के लिये निवेदन करने को वहाँ के सभी ऋषि आये॥४३ १/२॥

श्लोक:
स तेषां प्रतिशुश्राव राक्षसानां तदा वने॥४४॥
प्रतिज्ञातश्च रामेण वधः संयति रक्षसाम्।
ऋषीणामग्निकल्पानां दण्डकारण्यवासिनाम्॥४५॥

भावार्थ :-
‘उस समय वन में श्रीराम ने दण्डकारण्य वासी अग्नि के समान तेजस्वी उन ऋषियों को राक्षसों के मारने का वचन दिया और संग्राम में उनके वध की प्रतिज्ञा की॥४४-४५॥

श्लोक:
तेन तत्रैव वसता जनस्थाननिवासिनी।
विरूपिता शूर्पणखा राक्षसी कामरूपिणी॥४६॥

भावार्थ :-
‘वहाँ ही रहते हुए श्रीराम ने इच्छानुसार रूप बनाने वाली जनस्थान निवासिनी शूर्पणखा नाम की राक्षसी को [लक्ष्मण के द्वारा उसकी नाक कटाकर] कुरूप कर दिया॥४६॥

श्लोक:
ततः शूर्पणखावाक्यादुधुक्तान् सर्वराक्षसान्।
खरं त्रिशिरसं चैव दूषणं चैव राक्षसम्॥४७॥
निजघान रणे रामस्तेषां चैव पदानुगान्।

भावार्थ :-
‘तब शूर्पणखा के कहने से चढ़ाई करने वाले सभी राक्षसों को और खर, दूषण, त्रिशिरा तथा उनके पृष्ठ पोषक असुरों को रामने युद्ध में मार डाला॥४७ १/२॥

श्लोक:
वने तस्मिन् निवसता जनस्थाननिवासिनाम्॥४८॥
रक्षसां निहतान्यासन् सहस्राणि चतुर्दश।

भावार्थ :-
‘उस वन में निवास करते हुए उन्होंने जन स्थानवासी चौदह हजार राक्षसों का वध किया॥४८ १/२॥

श्लोक:
ततो ज्ञातिवधं श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्च्छितः॥४९॥
सहायं वरयामास मारीचं नाम राक्षसम्।

भावार्थ :-
‘तदनन्तर अपने कुटुम्ब का वध सुन कर रावण नाम का राक्षस क्रोध से मूर्च्छित हो उठा और उसने मारीच राक्षस से सहायता माँगी॥४९ १/२॥

श्लोक:
वार्यमाणः सुबहुशो मारीचेन स रावणः॥५०॥
न विरोधो बलवता क्षमो रावण तेन ते।
अनादृत्य तु तद्वाक्यं रावणः कालचोदितः॥५१॥
जगाम सहमारीचस्तस्याश्रमपदं तदा।

भावार्थ :-
‘यद्यपि मारीच ने यह कहकर कि ‘रावण! उस बलवान् राम के साथ तुम्हारा विरोध ठीक नहीं है’ रावण को अनेकों बार मना किया; परंतु काल की प्रेरणा से रावण ने मारीच के वाक्यों को टाल दिया और उसके साथ ही राम के आश्रम पर गया॥५०-५१ १/२॥

श्लोक:
तेन मायाविना दूरमपवाह्य नृपात्मजौ॥५२॥
जहार भार्यां रामस्य गृधं हत्वा जटायुषम्।

भावार्थ :-
‘मायावी मारीच के द्वारा उसने दोनों राजकुमारों को आश्रम से दूर हटा दिया और स्वयं राम की पत्नी सीता का अपहरण कर लिया, [जाते समय मार्ग में विघ्न डालने के कारण] उसने जटायु नामक गृध्र का वध किया॥५२ १/२॥

श्लोक:
गृधं च निहतं दृष्ट्वा हृतां श्रुत्वा च मैथिलीम्॥५३॥
राघवः शोकसंतप्तो विललापाकुलेन्द्रियः।

भावार्थ :-
‘तत्पश्चात् जटायु को आहत देखकर और (उसी के मुख से) सीता का हरण सुनकर रामचन्द्रजी शोक से पीड़ित होकर विलाप करने लगे, उस समय उनकी सभी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठी थीं॥५३ १/२॥

श्लोक:
ततस्तेनैव शोकेन गृधं दग्ध्वा जटायुषम्॥५४॥
मार्गमाणो वने सीतां राक्षसं संददर्श ह।
कबन्धं नाम रूपेण विकृतं घोरदर्शनम्॥५५॥
तं निहत्य महाबाहुर्ददाह स्वर्गतश्च सः।

भावार्थ :-
‘फिर उसी शोक में पड़े हुए उन्होंने जटायु गृध्र का अग्नि संस्कार किया और वन में सीता को ढूँढ़ते हुए कबन्ध नामक राक्षस को देखा, जो शरीर से विकृत तथा भयंकर दीखने वाला था। महाबाहु राम ने उसे मार कर उसका भी दाह किया, अतः वह स्वर्ग को चला गया॥५४-५५ १/२॥

श्लोक:
स चास्य कथयामास शबरी धर्मचारिणीम्॥५६॥
श्रमणां धर्मनिपुणामभिगच्छेति राघव।

भावार्थ :-
‘जाते समय उसने राम से धर्म चारिणी शबरी का पता बतलाया और कहा- ’रघुनन्दन! आप धर्मपरायणा संन्यासिनी शबरी के आश्रम पर जाइये’॥५६ १/२॥

श्लोक:
सोऽभ्यगच्छन्महातेजाः शबरीं शत्रुसूदनः॥५७॥
शबर्या पूजितः सम्यग् रामो दशरथात्मजः।

भावार्थ :-
‘शत्रुहन्ता महान् तेजस्वी दशरथ कुमार राम शबरी के यहाँ गये, उसने इनका भली भाँति पूजन किया॥५७ १/२॥

श्लोक:
पम्पातीरे हनुमता संगतो वानरेण ह॥५८॥
हनुमद्वचनाच्चैव सुग्रीवेण समागतः।

भावार्थ :-
‘फिर वे पम्पासर के तटपर हनुमान् नामक वानर से मिले और उन्हीं के कहने से सुग्रीव से भी मेल किया॥५८ १/२॥

श्लोक:
सुग्रीवाय च तत्सर्वं शंसद्रामो महाबलः॥५९॥
आदितस्तद् यथावृत्तं सीतायाश्च विशेषतः।

भावार्थ :-
‘तदनन्तर महाबलवान् राम ने आदि से ही लेकर जो कुछ हुआ था वह और विशेषतः सीता का वृत्तान्त सुग्रीव से कह सुनाया॥५९ १/२॥

श्लोक:
सुग्रीवश्चापि तत्सर्वं श्रुत्वा रामस्य वानरः॥६०॥
चकार सख्यं रामेण प्रीतश्चैवाग्निसाक्षिकम्।

भावार्थ :-
‘वानर सुग्रीव ने राम की सारी बातें सुनकर उनके साथ प्रेमपूर्वक अग्नि को साक्षी बनाकर मित्रता की॥६० १/२॥

श्लोक:
ततो वानरराजेन वैरानुकथनं प्रति॥६१॥
रामायावेदितं सर्वं प्रणयाद् दुःखितेन च।

भावार्थ :-
“उसके बाद वानरराज सुग्रीव ने स्नेहवश वाली के साथ वैर होने की सारी बातें राम से दुःखी होकर बतलायीं॥६१ १/२॥

श्लोक:
प्रतिज्ञातं च रामेण तदा वालिवधं प्रति॥६२॥
वालिनश्च बलं तत्र कथयामास वानरः।
सुग्रीवः शङ्कितश्चासीन्नित्यं वीर्येण राघवे॥६३॥

भावार्थ :-
‘उस समय राम ने वाली को मारने की प्रतिज्ञा की, तब वानर सुग्रीव ने वहाँ वाली के बल का वर्णन किया; क्योंकि सुग्रीव को रामके बल के विषय में बराबर शंका बनी रहती थी॥६२-६३॥

श्लोक:
राघवप्रत्ययार्थं तु दुन्दुभेः कायमुत्तमम्।
दर्शयामास सुग्रीवो महापर्वतसंनिभम्॥६४॥

भावार्थ :-
‘राम की प्रतीति के लिये उन्होंने दुन्दुभि दैत्य का महान् पर्वत के समान विशाल शरीर दिखलाया॥६४॥

श्लोक:
उत्स्मयित्वा महाबाहुः प्रेक्ष्य चास्थि महाबलः।
पादांगुष्ठेन चिक्षेप सम्पूर्णं दशयोजनम्॥६५॥

भावार्थ :-
‘महाबली महाबाहु श्रीराम ने तनिक मुसकरा कर उस अस्थिसमूह को देखा और पैर के अँगूठे से उसे दस योजन दूर फेंक दिया॥६५॥

श्लोक:
बिभेद च पुनस्तालान् सप्तैकेन महेषुणा।
गिरिं रसातलं चैव जनयन् प्रत्ययं तदा॥६६॥

भावार्थ :-
‘फिर एक ही महान् बाण से उन्होंने अपना। विश्वास दिलाते हुए सात तालवृक्षों को और पर्वत तथा रसातल को बींध डाला॥६६॥

श्लोक:
ततः प्रीतमनास्तेन विश्वस्तः स महाकपिः।
किष्किन्धां रामसहितो जगाम च गुहां तदा॥६७॥

भावार्थ :-
‘तदनन्तर राम के इस कार्य से महा कपि सुग्रीव मन ही-मन प्रसन्न हुए और उन्हें राम पर विश्वास हो गया। फिर वे उनके साथ किष्किन्धा गुहा में गये॥६७॥

श्लोक:
ततोऽगर्जद्धरिवरः सुग्रीवो हेमपिंगलः।
तेन नादेन महता निर्जगाम हरीश्वरः॥६८॥
अनुमान्य तदा तारां सुग्रीवेण समागतः।
निजघान च तत्रैनं शरेणैकेन राघवः॥६९॥

भावार्थ :-
‘वहाँ पर सुवर्ण के समान पिंगलवर्ण वाले वीरवर सुग्रीव ने गर्जना की, उस महानाद को सुनकर वानरराज वाली अपनी पत्नी तारा को आश्वासन देकर तत्काल घर से बाहर निकला और सुग्रीव से भिड़ गया। वहाँ राम ने वाली को एक ही बाण से मार गिराया॥६८-६९॥

श्लोक:
ततः सुग्रीववचनाद्धत्वा वालिनमाहवे।
सुग्रीवमेव तद्राज्ये राघवः प्रत्यपादयत्॥७०॥

भावार्थ :-
‘सुग्रीव के कथनानुसार उस संग्राम में वाली को मारकर उसके राज्यपर राम ने सुग्रीव को ही बिठा दिया॥७०॥

श्लोक:
स च सर्वान् समानीय वानरान् वानरर्षभः।
दिशः प्रस्थापयामास दिदृक्षुर्जनकात्मजाम्॥७१॥

भावार्थ :-
‘तब उन वानरराज ने भी सभी वानरों को बुलाकर जानकी का पता लगाने के लिये उन्हें चारों दिशाओं में भेजा॥७१॥

श्लोक:
ततो गृध्रस्य वचनात् सम्पातेर्हनुमान् बली।
शतयोजनविस्तीर्णं पुप्लुवे लवणार्णवम्॥७२॥

भावार्थ :-
‘तत्पश्चात् सम्पाति नामक गृध्र के कहने से बलवान् हनुमान जी सौ योजन विस्तार वाले क्षार समुद्र को कूदकर लाँघ गये॥७२॥

श्लोक:
तत्र लङ्कां समासाद्य पुरीं रावणपालिताम्।
ददर्श सीतां ध्यायन्तीमशोकवनिकां गताम्॥७३॥

भावार्थ :-
‘वहाँ रावण पालित लंकापुरी में पहुँचकर उन्होंने अशोक वाटिका में सीता को चिन्ता मग्न देखा॥७३॥

श्लोक:
निवेदयित्वाभिज्ञानं प्रवृत्तिं विनिवेद्य च।
समाश्वास्य च वैदेहीं मर्दयामास तोरणम्॥७४॥

भावार्थ :-
‘तब उन विदेहनन्दिनी को अपनी पहचान देकर राम का संदेश सुनाया और उन्हें सान्त्वना देकर उन्होंने वाटिका को तोड़ डाला॥७४॥

श्लोक:
पञ्च सेनाग्रगान् हत्वा सप्त मन्त्रिसुतानपि।
शूरमक्षं च निष्पिष्य ग्रहणं समुपागमत्॥७५॥

भावार्थ :-
‘फिर पाँच सेनापतियों और सात मन्त्रिकुमारों की हत्या कर वीर अक्षकुमार का भी कचूमर निकाला, इसके बाद वे [जान-बूझकर] पकड़े गये॥७५॥

श्लोक:
अस्त्रेणोन्मुक्तमात्मानं ज्ञात्वा पैतामहाद् वरात्।
मर्षयन् राक्षसान् वीरो यन्त्रिणस्तान् यदृच्छया॥७६॥

भावार्थ :-
‘ब्रह्माजी के वरदान से अपने को ब्रह्मपाश से छूटा हुआ जानकर भी वीर हनुमान जी ने अपने को बाँधने वाले उन राक्षसों का अपराध स्वेच्छानुसार सह लिया॥७६॥

श्लोक:
ततो दग्ध्वा पुरीं लङ्कामृते सीतां च मैथिलीम्।
रामाय प्रियमाख्यातुं पुनरायान्महाकपिः॥७७॥

भावार्थ :-
‘तत्पश्चात् मिथिलेशकुमारी सीता के [स्थान के] अतिरिक्त समस्त लंका को जलाकर वे महाकपि हनुमान् जी राम को प्रिय संदेश सुनाने के लिये लंका से लौट आये॥७७॥

श्लोक:
सोऽभिगम्य महात्मानं कृत्वा रामं प्रदक्षिणम्।
न्यवेदयदमेयात्मा दृष्टा सीतेति तत्त्वतः॥७८॥

भावार्थ :-
‘अपरिमित बुद्धिशाली हनुमान जी ने वहाँ जा महात्मा राम की प्रदक्षिणा करके यो सत्य निवेदन किया- ’मैंने सीताजी का दर्शन किया है’॥७८॥

श्लोक:
ततः सुग्रीवसहितो गत्वा तीरं महोदधेः।
समुद्रं क्षोभयामास शरैरादित्यसंनिभैः॥७९॥

भावार्थ :-
‘इसके अनन्तर सुग्रीव के साथ भगवान् राम ने महासागर के तटपर जाकर सूर्य के समान तेजस्वी बाणों से समुद्र को क्षुब्ध किया॥७९॥

श्लोक:
दर्शयामास चात्मानं समुद्रः सरितां पतिः।
समुद्रवचनाच्चैव नलं सेतुमकारयत्॥८०॥

भावार्थ :-
‘तब नदीपति समुद्र ने अपने को प्रकट कर दिया, फिर समुद्र के ही कहने से राम ने नल से पुल निर्माण कराया॥८०॥

श्लोक:
तेन गत्वा पुरीं लङ्कां हत्वा रावणमाहवे।
रामः सीतामनुप्राप्य परां व्रीडामुपागमत्॥८१॥

भावार्थ :-
‘उसी पुल से लंकापुरी में जाकर रावण को मारा, फिर सीता के मिलने पर राम को बड़ी लज्जा हुई॥८१॥

श्लोक:
तामुवाच ततो रामः परुषं जनसंसदि।
अमृष्यमाणा सा सीता विवेश ज्वलनं सती॥८२॥

भावार्थ :-
‘तब भरी सभा में सीता के प्रति वे मर्मभेदी वचन कहने लगे। उनकी इस बात को न सह सकने के कारण साध्वी सीता अग्नि में प्रवेश कर गयी॥८२॥

श्लोक:
ततोऽग्निवचनात् सीतां ज्ञात्वा विगतकल्मषाम्।
कर्मणा तेन महता त्रैलोक्यं सचराचरम्॥८३॥
सदेवर्षिगणं तुष्टं राघवस्य महात्मनः।

भावार्थ :-
‘इसके बाद अग्नि के कहने से उन्होंने सीता को निष्कलङ्क माना। महात्मा रामचन्द्रजी के इस महान् कर्म से देवता और ऋषियों सहित चराचर त्रिभुवन संतुष्ट हो गया॥८३ १/२॥

श्लोक:
बभौ रामः सम्प्रहृष्टः पूजितः सर्वदैवतैः॥ ८४॥
अभिषिच्य च लङ्कायां राक्षसेन्द्रं विभीषणम्।
कृतकृत्यस्तदा रामो विज्वरः प्रमुमोद ह॥८५॥

भावार्थ :-
‘फिर सभी देवताओं से पूजित होकर राम बहुत ही प्रसन्न हुए और राक्षसराज विभीषण को लंका के राज्य पर अभिषिक्त करके कृतार्थ हो गये। उस समय निश्चिन्त होने के कारण उनके आनन्द का ठिकाना न रहा॥८४-८५॥

श्लोक:
देवताभ्यो वरं प्राप्य समुत्थाप्य च वानरान्।
अयोध्यां प्रस्थितो रामः पुष्पकेण सुहृवृतः॥८६॥

भावार्थ :-
‘यह सब हो जाने पर राम देवताओं से वर पाकर। और मरे हुए वानरों को जीवन दिलाकर अपने सभी साथियों के साथ पुष्पक विमान पर चढ़कर अयोध्या के लिये प्रस्थित हुए॥८६॥

श्लोक:
भरद्वाजाश्रमं गत्वा रामः सत्यपराक्रमः।
भरतस्यान्तिके रामो हनूमन्तं व्यसर्जयत्॥८७॥

भावार्थ :-
‘भरद्वाज मुनि के आश्रम पर पहुँचकर सब को आराम देने वाले सत्यपराक्रमी राम ने भरत के पास हनुमान को भेजा॥८७॥

श्लोक:
पुनराख्यायिकां जल्पन् सुग्रीवसहितस्तदा।
पुष्पकं तत् समारुह्य नन्दिग्रामं ययौ तदा॥८८॥

भावार्थ :-
‘फिर सुग्रीव के साथ कथा-वार्ता कहते हुए पुष्पकारूढ़ हो वे नन्दिग्राम को गये॥८८॥

श्लोक:
नन्दिग्रामे जटां हित्वा भ्रातृभिः सहितोऽनघः।
रामः सीतामनुप्राप्य राज्यं पुनरवाप्तवान्॥८९॥

भावार्थ :-
‘निष्पाप रामचन्द्रजी ने नन्दिग्राम में अपनी जटा कटाकर भाइयों के साथ, सीता को पाने के अनन्तर, पुनः अपना राज्य प्राप्त किया है।८९॥

श्लोक:
प्रहृष्टमुदितो लोकस्तुष्टः पुष्टः सुधार्मिकः।
निरामयो ह्यरोगश्च दुर्भिक्षभयवर्जितः॥९०॥

भावार्थ :-
‘अब राम के राज्य में लोग प्रसन्न, सुखी, संतुष्ट, पुष्ट, धार्मिक तथा रोग-व्याधि से मुक्त रहेंगे, उन्हें दुर्भिक्ष का भय न होगा॥९०॥

श्लोक:
न पुत्रमरणं केचिद् द्रक्ष्यन्ति पुरुषाः क्वचित् ।
नार्यश्चाविधवा नित्यं भविष्यन्ति पतिव्रताः॥९१॥

भावार्थ :-
‘कोई कहीं भी अपने पुत्र की मृत्यु नहीं देखेंगे, स्त्रियाँ विधवा न होंगी, सदा ही पतिव्रता होंगी॥९१॥

श्लोक:
न चाग्निजं भयं किंचिन्नाप्सु मज्जन्ति जन्तवः।
न वातजं भयं किंचिन्नापि ज्वरकृतं तथा॥९२॥

भावार्थ :-
‘आग लगने का किंचित् भी भय न होगा, कोई प्राणी जल में नहीं डूबेंगे, वात और ज्वर का भय थोड़ा भी नहीं रहेगा॥ ९२॥

श्लोक:
न चापि क्षुद्भयं तत्र न तस्करभयं तथा।
नगराणि च राष्ट्राणि धनधान्ययुतानि च॥९३॥
नित्यं प्रमुदिताः सर्वे यथा कृतयुगे तथा।

भावार्थ :-
‘क्षुधा तथा चोरी का डर भी जाता रहेगा, सभी नगर और राष्ट्र धन-धान्य सम्पन्न होंगे। सत्ययुग की भाँति सभी लोग सदा प्रसन्न रहेंगे॥ ९३ १/२॥

श्लोक:
अश्वमेधशतैरिष्ट्वा तथा बहुसुवर्णकैः॥९४॥
गवां कोट्ययुतं दत्त्वा विद्वद्भयो विधिपूर्वकम्।
असंख्येयं धनं दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यो महायशाः॥९५॥
राजवंशान् शतगुणान् स्थापयिष्यति राघवः।
चातुर्वण्र्यं च लोकेऽस्मिन् स्वे स्वे धर्मे नियोक्ष्यति॥९६॥

भावार्थ :-
‘महायशस्वी राम बहुत-से सुवर्णों की दक्षिणा वाले सौ अश्वमेध यज्ञ करेंगे, उनमें विधिपूर्वक विद्वानों को दस हजार करोड़ (एक खरब) गौ और ब्राह्मणों को अपरिमित धन देंगे तथा सौगुने राजवंशों की स्थापना करेंगे। संसार में चारों वर्गों को वे अपने-अपने धर्म में नियुक्त रखेंगे॥९४-९६॥

श्लोक:
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च।
रामो राज्यमुपासित्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति॥९७॥

भावार्थ :-
‘फिर ग्यारह हजार वर्षां तक राज्य करने के अनन्तर। श्रीरामचन्द्र जी अपने परमधाम को पधारेंगे॥९७॥

श्लोक:
इदं पवित्रं पापघ्नं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम्।
यः पठेद् रामचरितं सर्वपापैः प्रमुच्यते॥९८॥

भावार्थ :-
‘वेदों के समान पवित्र, पाप नाशक और पुण्यमय इस रामचरित को जो पढ़ेगा, वह सब पापों से मुक्त हो जायगा॥९८॥

श्लोक:
एतदाख्यानमायुष्यं पठन् रामायणं नरः।
सपुत्रपौत्रः सगणः प्रेत्य स्वर्गे महीयते॥९९॥

भावार्थ :-
‘आयु बढ़ाने वाली इस रामायण-कथा को पढ़ने वाला मनुष्य मृत्यु के अनन्तर पुत्र, पौत्र तथा अन्य परिजनवर्ग के साथ ही स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होगा॥९९॥

श्लोक:
पठन् द्विजो वागृषभत्वमीयात् स्यात् क्षत्रियो भूमिपतित्वमीयात्।
वणिग्जनः पण्यफलत्वमीयाज्जनश्च शूद्रोऽपि महत्त्वमीयात्॥१००॥

भावार्थ :-
‘इसे ब्राह्मण पढ़े तो विद्वान् हो, क्षत्रिय पढ़ता हो तो पृथ्वी का राज्य प्राप्त करे, वैश्य को व्यापार में लाभ हो और शूद्र भी प्रतिष्ठा प्राप्त करे’॥१००॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे प्रथमः सर्गः॥१॥
(इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पहला सर्ग पूरा हुआ॥१॥)

AI बालकाण्ड सर्ग- २

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